43 दिन तक बर्फ में सोता रहा भारत का बेटा…

मां ने कहा—मेरे हनीफ को लाने के लिए किसी और सैनिक की जिंदगी खतरे में मत डालना

कारगिल की चोटियों से निकली एक ऐसी कहानी, जहां मजहब पीछे छूट गया और सामने रह गया सिर्फ हिंदुस्तान

कारगिल: श्यामल प्रतीक की नज़र से
विशेष कवर स्टोरी | श्यामल प्रतीक
रक्सौल अनुमंडल रिपोर्टर | चाणक्य न्यूज़ इंडिया

कल्पना कीजिए उस मां की।

उसे पता है कि उसका बेटा अब वापस चलकर दरवाजे तक नहीं आएगा।

उसे यह भी पता है कि उसका बेटा देश के लिए अपनी जिंदगी दे चुका है।

लेकिन वह उसे अंतिम बार देख भी नहीं सकती।

क्योंकि उसका बेटा हजारों फीट ऊपर कारगिल की बर्फीली और दुर्गम पहाड़ियों के बीच पड़ा है।

एक दिन गुजरा।

फिर दूसरा।

फिर एक सप्ताह।

और इंतजार बढ़ते-बढ़ते 43 दिनों तक पहुंच गया।

उस मां का नाम था हेमा अजीज।

और बर्फीली चोटियों पर उनका इंतजार कर रहा बेटा था—

कैप्टन हनीफ उद्दीन।

यह कहानी युद्धभूमि से पहले एक मां के साहस की भी है

जब परिस्थितियां ऐसी थीं कि हनीफ के पार्थिव शरीर को वापस लाने का प्रयास दूसरे सैनिकों की जान को भी जोखिम में डाल सकता था, तब उनकी मां ने जो भावना व्यक्त की, उसने सैनिक परिवारों के साहस का एक अलग चेहरा दुनिया के सामने रखा।

एक मां अपने बेटे को अंतिम बार देखना चाहती थी।

लेकिन वह किसी दूसरी मां का बेटा खतरे में डालकर ऐसा नहीं चाहती थी।

यहीं कैप्टन हनीफ की कहानी केवल एक सैनिक की कहानी नहीं रह जाती।

यह एक सैनिक परिवार के त्याग की कहानी बन जाती है।

कहानी अब 43 दिन पीछे जाती है…

वर्ष था 1999।

कारगिल की चोटियों पर भारतीय सैनिक कठिन परिस्थितियों में लड़ रहे थे।

ऊंचाई, जमा देने वाली ठंड और दुर्गम पहाड़ियां स्वयं एक चुनौती थीं; सामने दुश्मन की मजबूत स्थिति एक दूसरी चुनौती।

इन्हीं परिस्थितियों में केवल 25 वर्ष के कैप्टन हनीफ उद्दीन मोर्चे पर थे।

वे Army Service Corps के अधिकारी थे और उस समय 11 राजपूताना राइफल्स के साथ सेवा दे रहे थे।

6 जून 1999।

उनका दल दुर्गम क्षेत्र में आगे बढ़ा।

फायरिंग हुई।

स्थिति बेहद कठिन हो गई।

लेकिन भारतीय सैनिक पीछे नहीं हटे।

इसी कार्रवाई के दौरान कैप्टन हनीफ उद्दीन ने अदम्य साहस दिखाया और मातृभूमि की रक्षा करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए।

उनकी वीरता को राष्ट्र ने बाद में वीर चक्र से सम्मानित किया।

लेकिन हनीफ की कहानी में एक और हिंदुस्तान छिपा है

इस कहानी को लिखते हुए मुझे सबसे ज्यादा जिस बात ने रोका, वह उनकी उम्र या युद्धभूमि नहीं थी।

वह थी उनकी पहचान।

हनीफ की मां हेमा अजीज हिंदू थीं और पिता अजीज उद्दीन मुस्लिम।

एक ऐसा परिवार जिसमें भारत की विविधता घर के भीतर ही सांस लेती थी।

और उसी घर से निकला बेटा भारतीय सेना की वर्दी पहनकर कारगिल पहुंचा।

वहां उसकी पहचान न हिंदू थी, न मुस्लिम।

उसकी पहचान थी—

भारतीय सेना।

उसके कंधे पर देश की जिम्मेदारी थी।

और सामने तिरंगा।

शायद इसी को भारत कहते हैं…

मेरी नजर में हनीफ की कहानी को केवल युद्ध के नक्शे पर समझना अधूरा होगा।

उसे भारत के नक्शे पर देखिए।

एक मां की धार्मिक पृष्ठभूमि अलग।

पिता की अलग।

बेटा भारतीय सेना में।

और जिस 11 राजपूताना राइफल्स के साथ वह लड़ रहा था, उसकी सैन्य परंपरा में गूंजता युद्धघोष—

“राजा रामचंद्र की जय।”

फिर सोचिए—

उस पहाड़ पर हनीफ की पहचान क्या थी?

उत्तर बहुत छोटा है।

हिंदुस्तानी।

यही भारतीय सेना की खूबसूरती है।

यहां पूजा की पद्धति अलग हो सकती है, नाम अलग हो सकते हैं, घरों की परंपराएं अलग हो सकती हैं—

लेकिन जब सैनिक वर्दी पहनता है तो उसके सीने पर लिखा एक अदृश्य शब्द उन सभी पहचानों से बड़ा हो जाता है—

भारत।

और आखिरकार वह दिन आया…

43 दिनों का इंतजार समाप्त हुआ।

दुर्गम परिस्थितियों के बीच भारतीय सेना अपने साथी को वापस लेकर आई।

हनीफ घर लौटे।

लेकिन उस तरह नहीं, जैसा कोई मां अपने 25 साल के बेटे के लौटने की कल्पना करती है।

एक सैनिक वापस आया था—

तिरंगे के सम्मान और पूरे देश के गर्व के साथ।

उनकी वीरता की स्मृति को कारगिल की भौगोलिक पहचान में भी स्थान मिला।

जिस इलाके में उन्होंने सर्वोच्च बलिदान दिया, उसे बाद में “सब-सेक्टर हनीफ” के नाम से जाना गया।

यानी वह सैनिक चला गया—

लेकिन पहाड़ ने उसका नाम रख लिया।

आज मैंने हनीफ की कहानी क्यों चुनी?

कारगिल के वीरों पर लिखते हुए मेरे सामने वीरता की अनेक असाधारण कहानियां आती हैं।

लेकिन कैप्टन हनीफ उद्दीन की कहानी मेरे लिए कुछ अलग है।

क्योंकि इसमें मुझे केवल युद्ध नहीं दिखाई देता।

मुझे एक मां दिखाई देती है।

मुझे 25 साल का एक बेटा दिखाई देता है।

मुझे भारतीय सेना की वह परंपरा दिखाई देती है जिसमें साथी के लिए साथी अंतिम सीमा तक जाता है।

और सबसे बढ़कर—

मुझे इसमें अपना भारत दिखाई देता है।

वह भारत जो मंदिर और मस्जिद के बीच नहीं बंटता।

वह भारत जो सैनिक की नेमप्लेट पढ़ने से पहले उसकी वर्दी देखता है।

वह भारत जहां अंतिम पहचान मजहब नहीं—

तिरंगा होता है।

श्यामल प्रतीक की कलम से

कैप्टन हनीफ उद्दीन,

मैं आपको कभी देख नहीं पाया।

उस युद्धभूमि पर भी नहीं था जहां आपने अंतिम लड़ाई लड़ी।

लेकिन आपकी कहानी लिखते हुए एक सवाल बार-बार मन में आया—

25 वर्ष की उम्र में कोई इंसान अपने देश को अपने भविष्य से बड़ा कैसे मान लेता है?

शायद इसका जवाब किसी किताब में नहीं मिलेगा।

उसका जवाब उस वर्दी में मिलेगा जिसे आपने पहना था।

उस तिरंगे में मिलेगा जिसके लिए आपने लड़ाई लड़ी।

और उस मां के साहस में मिलेगा जिसने अपने बेटे के लिए किसी दूसरे सैनिक की जिंदगी खतरे में डालने से इनकार कर दिया।

आज आपके बलिदान को याद करते हुए मैं केवल इतना लिखना चाहता हूं—

कारगिल की बर्फ पिघल सकती है,
वहां पड़े कदमों के निशान मिट सकते हैं,
लेकिन जिस पहाड़ ने अपने एक हिस्से का नाम “हनीफ” रख लिया हो,
वह अपने सैनिक को कभी नहीं भूल सकता।

कैप्टन हनीफ उद्दीन को शत्-शत् नमन।

आप किसी एक धर्म के वीर नहीं—मेरे हिंदुस्तान के वीर हैं।

जय हिंद।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *