कारगिल: श्यामल प्रतीक की नज़र से
13 जून 1999 को मातृभूमि के लिए सर्वोच्च बलिदान; अदम्य साहस और नेतृत्व के लिए मरणोपरांत महावीर चक्र से सम्मानित
विशेष कवर स्टोरी | श्यामल प्रतीक
कारगिल की बर्फीली चोटियां आज शांत हैं, लेकिन 1999 की उस लड़ाई की स्मृतियां भारतीय सैन्य इतिहास में हमेशा जीवित रहेंगी। उन्हीं चोटियों में एक था तोलोलिंग, जहां भारतीय सेना की विजय ने ऑपरेशन विजय को नई गति और देश को नया विश्वास दिया। इस ऐतिहासिक लड़ाई के अग्रिम मोर्चे पर खड़े वीरों में एक नाम था—2 राजपूताना राइफल्स के मेजर विवेक गुप्ता, महावीर चक्र।
मेजर विवेक गुप्ता ने अपने सैनिकों का नेतृत्व पीछे से नहीं, बल्कि स्वयं आगे बढ़कर किया। दुर्गम पहाड़, प्रतिकूल मौसम और ऊंचाई पर मजबूत शत्रु मोर्चे—इन कठिन परिस्थितियों के बावजूद उनका लक्ष्य स्पष्ट था: तोलोलिंग पर भारतीय तिरंगे की विजय सुनिश्चित करना।
सेना की परंपरा में पले, मातृभूमि के लिए जिए
2 जनवरी 1970 को देहरादून में जन्मे विवेक गुप्ता सैन्य परिवेश में पले-बढ़े। सैन्य प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद 13 जून 1992 को वे भारतीय सेना की राजपूताना राइफल्स में कमीशन हुए।
कर्तव्य, अनुशासन और नेतृत्व उनके सैन्य जीवन की पहचान बने। लेकिन शायद इतिहास ने 13 जून की तारीख को उनके जीवन में एक असाधारण स्थान देने का निर्णय पहले ही कर रखा था।
तोलोलिंग: जहां हर कदम चुनौती था
कारगिल युद्ध के दौरान तोलोलिंग की चोटी सामरिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण थी। ऊंचाई पर मौजूद दुश्मन भारतीय सैनिकों की गतिविधियों पर नजर रखने और नीचे के महत्वपूर्ण मार्ग को प्रभावित करने की स्थिति में था।
इसे वापस हासिल करना आवश्यक था।
2 राजपूताना राइफल्स को इस कठिन अभियान की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी मिली। मेजर विवेक गुप्ता अपनी कंपनी का नेतृत्व करते हुए आगे बढ़े।
यह सामान्य युद्धभूमि नहीं थी। खड़ी चट्टानों और अत्यधिक ऊंचाई के बीच भारतीय जवानों को ऊपर चढ़ना था, जबकि सामने से लगातार प्रतिरोध मिल रहा था।
इसके बावजूद भारतीय सैनिक आगे बढ़ते रहे।
घायल हुए, लेकिन कदम नहीं रुके
अभियान के दौरान मेजर विवेक गुप्ता घायल हुए, लेकिन उन्होंने पीछे हटने के बजाय अपने जवानों के साथ आगे बढ़ना जारी रखा।
उनका साहस सैनिकों के लिए प्रेरणा बन गया।
वे जानते थे कि इस अभियान की सफलता केवल एक सैन्य चौकी पर कब्जे का प्रश्न नहीं थी—तोलोलिंग की विजय कारगिल में आगे होने वाले भारतीय अभियानों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण थी।
भीषण संघर्ष के बीच भारतीय सैनिक शत्रु के मोर्चों तक पहुंचे और निर्णायक मुकाबला हुआ।
13 जून 1999—जब एक अधिकारी इतिहास बन गया
युद्ध के दौरान 13 जून 1999 को मेजर विवेक गुप्ता वीरगति को प्राप्त हुए।
यह तारीख अपने भीतर एक मार्मिक संयोग समेटे हुए है।
13 जून 1992 को उन्होंने भारतीय सेना में अधिकारी के रूप में अपना सफर शुरू किया था और ठीक सात वर्ष बाद 13 जून 1999 को मातृभूमि की रक्षा करते हुए उन्होंने सर्वोच्च बलिदान दिया।
एक 13 जून ने उन्हें भारतीय सेना का अधिकारी बनाया था।
दूसरे 13 जून ने उन्हें भारत के सैन्य इतिहास में अमर कर दिया।
तोलोलिंग पर तिरंगा और बदलता युद्ध
भारतीय सैनिकों ने अंततः तोलोलिंग पर विजय हासिल की। इस सफलता ने कारगिल युद्ध में भारतीय सेना के मनोबल को नई ऊंचाई दी और आगे की लड़ाइयों के लिए महत्वपूर्ण मार्ग प्रशस्त किया।
मेजर विवेक गुप्ता उस विजय का उत्सव देखने के लिए मौजूद नहीं थे, लेकिन उनकी वीरता और उनके साथियों का संघर्ष उस विजय की नींव में हमेशा के लिए दर्ज हो चुका था।
उनके असाधारण साहस, नेतृत्व और सर्वोच्च बलिदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें मरणोपरांत महावीर चक्र से सम्मानित किया।
श्यामल प्रतीक की कलम से
कारगिल केवल 1999 में लड़ा गया एक युद्ध नहीं है। यह उन सैनिकों की कहानी है जिन्होंने कठिन से कठिन परिस्थितियों में यह साबित किया कि राष्ट्र की रक्षा के सामने व्यक्तिगत जीवन भी छोटा पड़ सकता है।
तोलोलिंग की चट्टानों पर आज गोलियों की आवाज नहीं सुनाई देती। वहां बर्फ गिरती है, हवाएं गुजरती हैं और तिरंगा अपनी पूरी शान से लहराता है।
लेकिन इतिहास की आवाज को यदि सुना जाए, तो उन पहाड़ों के बीच आज भी एक नाम गूंजता महसूस होता है |
मेजर विवेक गुप्ता।
उन्होंने विजय देखने के लिए अपना जीवन नहीं बचाया; उन्होंने अपना जीवन देकर विजय का रास्ता बनाया।
आने वाली पीढ़ियों के लिए उनका बलिदान केवल इतिहास की एक घटना नहीं, बल्कि यह संदेश है कि देश की सीमाएं नक्शे पर खींची गई रेखाओं से नहीं, बल्कि अपने कर्तव्य पर अडिग खड़े सैनिकों के साहस और बलिदान से सुरक्षित रहती हैं।
मेजर विवेक गुप्ता, महावीर चक्र (मरणोपरांत)—भारत आपके शौर्य और सर्वोच्च बलिदान को सदैव स्मरण रखेगा।
🇮🇳 शत-शत नमन।
