कारगिल से बालाकोट तक
1999 में कारगिल ने अजय आहूजा को हमसे छीन लिया; उसी दौर में नंबर-17 स्क्वाड्रन की कमान संभाल रहे बी.एस. धनोआ 2019 में वायुसेना प्रमुख थे—और इस बार पाकिस्तान की हिरासत में पहुंचा भारतीय पायलट अभिनंदन वर्धमान घर लौट आया
विशेष कवर स्टोरी | श्यामल प्रतीक
रक्सौल अनुमंडल रिपोर्टर | चाणक्य न्यूज़ इंडिया
कभी-कभी इतिहास अपनी कहानी एक बार में पूरी नहीं करता।
वह एक पन्ना लिखकर उसे अधूरा छोड़ देता है और वर्षों बाद दूसरा पन्ना खोलता है। तारीखें बदल जाती हैं, चेहरे बदल जाते हैं, पद बदल जाते हैं—लेकिन कहीं कोई पुरानी स्मृति फिर सामने खड़ी दिखाई देती है।
भारतीय वायुसेना की ऐसी ही एक कहानी 27 मई 1999 से शुरू होकर 1 मार्च 2019 और फिर 2 सितंबर 2019 तक पहुंचती है।
पहली तारीख के साथ जुड़ा है स्क्वाड्रन लीडर अजय आहूजा का सर्वोच्च बलिदान।
दूसरी के साथ जुड़ी है विंग कमांडर अभिनंदन वर्धमान की स्वदेश वापसी।
और इन दोनों अध्यायों के बीच एक नाम मौजूद है—
बी.एस. धनोआ।
मेरी नजर में यह केवल तीन वायुयोद्धाओं की कहानी नहीं है।
यह उस वर्दी की कहानी है, जिसमें अपने साथी को खोने का दर्द भी होता है और अगले साथी को घर वापस देखने की उम्मीद भी।
27 मई 1999 : कारगिल के आसमान से नहीं लौटा एक बेटा
कारगिल की बर्फीली चोटियों पर युद्ध चल रहा था।
जमीन पर भारतीय सैनिक दुश्मन की ऊंची चौकियों से मुकाबला कर रहे थे और आसमान में भारतीय वायुसेना ऑपरेशन ‘सफेद सागर’ के तहत मोर्चा संभाल रही थी।
उस समय नंबर-17 स्क्वाड्रन ‘गोल्डन एरोज’ की कमान विंग कमांडर बी.एस. धनोआ के हाथों में थी।
इसी युद्ध में थे स्क्वाड्रन लीडर अजय आहूजा।
27 मई 1999 को उनका MiG-21 दुश्मन की मिसाइल की चपेट में आया। उन्होंने विमान से इजेक्ट किया।
लेकिन वे जीवित भारत वापस नहीं लौट सके।
बाद में उनका पार्थिव शरीर भारत को सौंपा गया। पोस्टमार्टम में गोली लगने की चोटें सामने आने के बाद भारत ने आरोप लगाया कि सुरक्षित इजेक्शन के बाद उन्हें मार दिया गया था।
उस दिन सिर्फ एक विमान नहीं गिरा था।
एक परिवार ने अपना बेटा खोया था।
भारतीय वायुसेना ने अपना योद्धा खोया था।
और उसके साथियों ने अपना साथी।
कारगिल युद्ध आगे बढ़ा। भारत ने विजय प्राप्त की। तिरंगा चोटियों पर फिर लहराया।
लेकिन हर विजय अपने पीछे कुछ ऐसे नाम छोड़ जाती है जिन्हें राष्ट्र कभी वापस नहीं ला सकता।
अजय आहूजा उन्हीं नामों में से एक हैं।
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फिर बीस वर्ष बीत गए…
समय अपनी गति से चलता रहा।
1999 में नंबर-17 स्क्वाड्रन की कमान संभालने वाले बी.एस. धनोआ आगे बढ़ते हुए भारतीय वायुसेना के सर्वोच्च पद तक पहुंचे।
2019 में वे चीफ ऑफ द एयर स्टाफ थे।
लेकिन शायद उनकी स्मृतियों में कारगिल का वह आसमान कभी पूरी तरह धुंधला नहीं पड़ा होगा।
और फिर फरवरी 2019 आया।
पुलवामा आतंकी हमले के बाद भारत ने बालाकोट में हवाई कार्रवाई की। अगले दिन, 27 फरवरी 2019, भारत और पाकिस्तान के लड़ाकू विमानों के बीच हवाई संघर्ष हुआ।
भारतीय वायुसेना की ओर से आसमान में जाने वालों में एक नाम था—
विंग कमांडर अभिनंदन वर्धमान।
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फिर एक MiG-21… फिर इजेक्शन… और फिर पाकिस्तान
अभिनंदन ने MiG-21 Bison के साथ हवाई संघर्ष में हिस्सा लिया। भारतीय वायुसेना के अनुसार उन्होंने पाकिस्तानी F-16 को निशाना बनाया।
लेकिन इसी संघर्ष में उनका अपना विमान भी गिर गया।
उन्हें इजेक्ट करना पड़ा।
वे नियंत्रण रेखा के उस पार उतरे और पाकिस्तान की हिरासत में पहुंच गए।
भारत में खबर पहुंची।
पूरा देश अपने वायुयोद्धा की ओर देख रहा था।
एक सैनिक सीमा पार था।
उसका परिवार इंतजार कर रहा था।
वायुसेना इंतजार कर रही थी।
और देश इंतजार कर रहा था।
मेरे लिए यहीं इतिहास के दो पन्ने अचानक एक-दूसरे के बहुत करीब आ जाते हैं।
1999 में भी एक भारतीय पायलट MiG-21 से इजेक्ट करने के बाद सीमा के उस पार पहुंचा था।
2019 में भी एक भारतीय पायलट MiG-21 से इजेक्ट करने के बाद पाकिस्तान के कब्जे में था।
लेकिन इस बार भारत की एक ही इच्छा थी—
हमारा वायुयोद्धा वापस घर आए।
—
और इस बार कहानी बदल गई…
28 फरवरी को पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री इमरान खान ने अपनी संसद में घोषणा की कि अभिनंदन वर्धमान को रिहा किया जाएगा।
फिर आया—
1 मार्च 2019।
अटारी-वाघा सीमा पर देश की निगाहें टिकी थीं।
इंतजार समाप्त हुआ।
सीमा के उस पार से एक भारतीय वायुयोद्धा चलता हुआ अपनी मातृभूमि की ओर आया।
विंग कमांडर अभिनंदन वर्धमान भारत लौट चुके थे।
उनकी वापसी के पीछे भारत के कूटनीतिक प्रयासों और उस समय अपनाए गए दृढ़ सैन्य रुख को महत्वपूर्ण माना गया, जबकि पाकिस्तान ने इसे तनाव कम करने की पहल बताया।
राजनीतिक और कूटनीतिक विश्लेषण अपनी जगह हैं।
लेकिन एक सैनिक के परिवार और एक देश के लिए उस क्षण का अर्थ कहीं सरल था—
हमारा बेटा वापस आ गया था।
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1999 में अजय नहीं लौटे थे… 2019 में अभिनंदन लौट आए
यहीं यह कहानी मेरे लिए आंकड़ों, विमानों और सैन्य अभियानों से आगे निकल जाती है।
मैं अजय आहूजा और अभिनंदन वर्धमान की घटनाओं को समान नहीं मानता।
क्योंकि अजय की कहानी सर्वोच्च बलिदान की कहानी है।
और अभिनंदन की कहानी साहस के साथ घर वापसी की।
लेकिन दोनों घटनाओं के बीच खड़े बी.एस. धनोआ इस इतिहास को एक असाधारण मानवीय कड़ी देते हैं।
1999 में वे स्क्वाड्रन कमांडर थे।
2019 में वे पूरे भारतीय वायुसेना के प्रमुख थे।
बीस वर्षों में उनका पद बदल चुका था।
समय बदल चुका था।
देश की सामरिक क्षमता और परिस्थितियां बदल चुकी थीं।
और इस बार पाकिस्तान की हिरासत में पहुंचा भारतीय वायुयोद्धा जीवित स्वदेश लौट आया था।
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लेकिन इतिहास ने अभी आखिरी दृश्य बचाकर रखा था…
अभिनंदन भारत लौट आए।
कहानी यहां समाप्त हो सकती थी।
लेकिन छह महीने बाद एक ऐसी तस्वीर सामने आई जिसने 1999 और 2019 के बीच की इस भावनात्मक कड़ी को और गहरा कर दिया।
2 सितंबर 2019।
पठानकोट एयरबेस।
एक दो सीटों वाला MiG-21 Trainer उड़ान भरने के लिए तैयार था।
उसमें सवार थे—
एयर चीफ मार्शल बी.एस. धनोआ
और
विंग कमांडर अभिनंदन वर्धमान।
दोनों ने साथ उड़ान भरी।
लगभग 30 मिनट की यह sortie बी.एस. धनोआ की सेवानिवृत्ति से पहले उनकी आखिरी लड़ाकू विमान उड़ान थी।
और इस कहानी में एक और रिश्ता था।
धनोआ अभिनंदन के पिता एयर मार्शल एस. वर्धमान के साथ भी अपने सेवाकाल में उड़ान भर चुके थे।
एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक…
एक पिता से बेटे तक…
कारगिल से बालाकोट तक…
और अंत में उसी MiG-21 के आसमान में एक साथ उड़ते दो वायुयोद्धा।
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मेरी नजर में वह सिर्फ आखिरी उड़ान नहीं थी…
जब मैं उस तस्वीर को देखता हूं तो मुझे उसमें केवल एक वायुसेना प्रमुख और एक विंग कमांडर दिखाई नहीं देते।
मुझे उसके पीछे बीस वर्ष का इतिहास दिखाई देता है।
मुझे 1999 का कारगिल दिखाई देता है।
मुझे अजय आहूजा दिखाई देते हैं।
मुझे 2019 का वह बेचैन इंतजार दिखाई देता है।
मुझे सीमा पार से वापस आते अभिनंदन दिखाई देते हैं।
और फिर मुझे पठानकोट से उड़ता वह MiG-21 दिखाई देता है।
एक ऐसी उड़ान, जिसमें शायद यादें भी साथ उड़ रही थीं।
कुछ यादें विजय की।
कुछ अपने खोए हुए साथियों की।
और कुछ उस संतोष की कि इस बार एक भारतीय वायुयोद्धा वापस अपने घर पहुंच गया था।
—
हर सैनिक को वापस लाना संभव नहीं होता…
युद्ध की सबसे कठोर सच्चाई यही है।
हर सैनिक घर वापस नहीं आता।
हर मां के दरवाजे पर उसका बेटा वापस नहीं पहुंचता।
हर साथी को बचा पाना संभव नहीं होता।
इसीलिए जो लौटकर नहीं आते, राष्ट्र उन्हें अपने इतिहास में हमेशा के लिए जगह देता है।
और जो कठिन परिस्थितियों से वापस लौटते हैं, उन्हें देखकर देश को यह विश्वास मिलता है कि—
वर्दी अपने साथी को कभी भूलती नहीं।
अजय आहूजा की शहादत को किसी दूसरी घटना से मापा नहीं जा सकता।
उनका बलिदान स्वयं में पूर्ण है।
अभिनंदन की वापसी भी स्वयं में एक अलग अध्याय है।
लेकिन बी.एस. धनोआ की मौजूदगी इन दोनों अध्यायों के बीच मानो एक पुल बनाती है।
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श्यामल प्रतीक की श्रद्धांजलि 🇮🇳
कारगिल की कहानी लिखते समय मेरे लिए सबसे कठिन काम शहीदों की संख्या लिखना नहीं है।
सबसे कठिन है यह समझना कि हर नाम के पीछे एक घर था।
कोई मां इंतजार करती रही होगी।
कोई पिता अपने बेटे की वर्दी को देखता रहा होगा।
कोई साथी अपने साथ उड़ने वाले पायलट की खाली जगह को महसूस करता रहा होगा।
स्क्वाड्रन लीडर अजय आहूजा भी हमारे लिए केवल इतिहास की एक तारीख नहीं हैं।
वे उस भारतीय सैनिक परंपरा के प्रतीक हैं जिसमें कर्तव्य जीवन से भी बड़ा हो जाता है।
और अभिनंदन वर्धमान की वापसी हमें यह याद दिलाती है कि युद्ध और संघर्ष के सबसे कठिन क्षणों में भी उम्मीद का दरवाजा बंद नहीं होता।
जब मैं बी.एस. धनोआ और अभिनंदन की उस आखिरी MiG-21 उड़ान को देखता हूं तो मन में एक ही विचार आता है—
शायद कुछ यात्राएं जमीन पर पूरी नहीं होतीं।
वे आसमान में पूरी होती हैं।
1999 में कारगिल के आसमान में एक वायुयोद्धा हमेशा के लिए इतिहास का हिस्सा बन गया था।
बीस वर्ष बाद उसी भारतीय वायुसेना का एक दूसरा वायुयोद्धा सीमा पार से सुरक्षित घर लौट आया।
और फिर दोनों दौरों का साक्षी रहा एक कमांडर अपनी अंतिम लड़ाकू उड़ान पर निकल पड़ा।
मेरे लिए उस दिन आसमान में सिर्फ MiG-21 नहीं उड़ रहा था।
उसके साथ अजय आहूजा की स्मृति थी।
अभिनंदन की सुरक्षित वापसी की खुशी थी।
और बी.एस. धनोआ के लगभग चार दशक लंबे सैन्य जीवन की यादें थीं।
कुछ वीर घर लौट आते हैं।
कुछ वीर तिरंगे में लौटते हैं।
लेकिन देश की स्मृतियों से कोई वीर कभी नहीं जाता।
स्क्वाड्रन लीडर अजय आहूजा को मेरी विनम्र श्रद्धांजलि।
अभिनंदन वर्धमान के साहस को सलाम।
और भारतीय वायुसेना के उन तमाम योद्धाओं को नमन, जिनके कारण भारत का आसमान सुरक्षित है।
जय हिंद। 🇮🇳
जय भारतीय वायुसेना।
— श्यामल प्रतीक
रक्सौल अनुमंडल रिपोर्टर
चाणक्य न्यूज़ इंडिया
