कारगिल की निर्णायक लड़ाई में 2 राजपूताना राइफल्स के नायक दिगेंद्र कुमार ने दिखाई असाधारण वीरता; महावीर चक्र से सम्मानित
विशेष कवर स्टोरी | श्यामल प्रतीक की कलम से
कारगिल की कहानी केवल उन चोटियों की कहानी नहीं है, जिन्हें भारतीय सेना ने दुश्मन के कब्जे से मुक्त कराया। यह उन सैनिकों के अदम्य संकल्प की कहानी है, जिन्होंने दुर्गम पहाड़, जमा देने वाली ठंड और सामने से आती भीषण गोलीबारी के बावजूद एक ही लक्ष्य देखा—चोटी पर तिरंगा।
ऐसी ही एक अमर वीरगाथा है 2 राजपूताना राइफल्स के नायक दिगेंद्र कुमार, महावीर चक्र की।
तोलोलिंग—जहां कारगिल युद्ध ने निर्णायक मोड़ लिया
1999 के कारगिल युद्ध में द्रास सेक्टर की तोलोलिंग चोटी सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण थी। इस पर कब्जा वापस पाना भारतीय सेना के लिए एक बड़ी चुनौती थी।
12 जून 1999 को 2 राजपूताना राइफल्स ने तोलोलिंग पर निर्णायक आक्रमण शुरू किया। तत्कालीन थलसेना प्रमुख जनरल वी.पी. मलिक के युद्ध-वृत्तांत के अनुसार, 13 जून को भारतीय सैनिकों ने तोलोलिंग फीचर पर पुनः नियंत्रण स्थापित कर लिया। इसी लड़ाई में नायक दिगेंद्र कुमार सहित 2 राजपूताना राइफल्स के अनेक सैनिकों ने प्रेरणादायक वीरता दिखाई।
जब घायल होने के बाद भी नहीं रुके दिगेंद्र
नायक दिगेंद्र कुमार अपनी कंपनी के लाइट मशीन गन डिटैचमेंट के कमांडर थे।
12-13 जून की रात जब उनका असॉल्ट ग्रुप अपने लक्ष्य के निकट पहुंचा, तब छिपी हुई दुश्मन चौकी से तीव्र गोलीबारी हुई। दिगेंद्र कुमार के बाएं हाथ में गोली लगी।
लेकिन उन्होंने पीछे हटने के बजाय मोर्चा संभाले रखा।
उपलब्ध सैन्य विवरण के अनुसार, घायल अवस्था में भी उन्होंने अपने साथियों को प्रभावी कवरिंग फायर दिया, जिससे भारतीय सैनिक आगे बढ़कर दुश्मन की मजबूत स्थिति को साफ करने में सफल हुए।
यही वह क्षण था जब एक सैनिक का व्यक्तिगत साहस पूरी टुकड़ी के अभियान की शक्ति बन गया।
तोलोलिंग पर विजय—कारगिल का बड़ा संदेश
तोलोलिंग की जीत भारतीय सेना के लिए कारगिल युद्ध की सबसे महत्वपूर्ण शुरुआती सफलताओं में से थी। इसके बाद भारतीय सेना ने दूसरे कब्जाए गए ठिकानों को मुक्त कराने की दिशा में अपना अभियान और तेज किया। भारत सरकार भी तोलोलिंग को कारगिल युद्ध के सबसे प्रतिष्ठित युद्धक्षेत्रों में गिनती है।
नायक दिगेंद्र कुमार की असाधारण वीरता को राष्ट्र ने महावीर चक्र, भारत के दूसरे सर्वोच्च युद्धकालीन वीरता पुरस्कार, से सम्मानित किया। बाद के वर्षों में भी वे कारगिल के जीवित वीरों के प्रतिनिधि के रूप में राष्ट्रीय स्मरण समारोहों में उपस्थित रहे हैं; 2023 के कारगिल विजय दिवस समारोह में रक्षा मंत्रालय ने विशेष रूप से उनकी उपस्थिति का उल्लेख किया था।
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श्यामल प्रतीक की कलम से
कुछ सैनिक युद्ध जीतकर लौटते हैं, लेकिन अपने पीछे ऐसी कहानी छोड़ जाते हैं जो पीढ़ियों को लड़ना नहीं, बल्कि कर्तव्य के सामने कभी हार न मानना सिखाती है।
मेरे लिए नायक दिगेंद्र कुमार की कहानी उसी संकल्प की कहानी है।
तोलोलिंग की कठिन चढ़ाई और घायल होने के बावजूद उनका डटे रहना बताता है कि भारत की सीमाएं केवल नक्शे पर खींची रेखाओं से सुरक्षित नहीं रहतीं—उनकी रक्षा उन सैनिकों के साहस से होती है, जो संकट की सबसे कठिन घड़ी में भी अपने कर्तव्य से पीछे नहीं हटते।
जब भी कारगिल की चोटियों पर तिरंगा हवा से बातें करेगा, तोलोलिंग की धरती उन वीरों की याद दिलाती रहेगी जिन्होंने राष्ट्र के सम्मान को अपने जीवन और रक्त से सींचा।
नायक दिगेंद्र कुमार जैसे योद्धा केवल सेना के गौरव नहीं—वे भारत की आने वाली पीढ़ियों के लिए साहस, कर्तव्य और राष्ट्रप्रेम की जीवित पाठशाला हैं।
सलाम तोलोलिंग के वीर को।
सलाम 2 राजपूताना राइफल्स को।
सलाम भारतीय सेना को। 🇮🇳
कारगिल की चोटियां आज भी कहती हैं—यह विजय हमें विरासत में नहीं मिली, इसे हमारे सैनिकों ने अपने अदम्य साहस से अर्जित किया था।
