जहां हर दिन सीमा की निगहबानी करते हैं SSB के जवान, वहीं आज बच्चों के हाथों में तिरंगा और गांवों की जुबां पर था देशप्रेम—71वीं वाहिनी की रैली ने भारत-नेपाल सीमा पर लिखी राष्ट्रभाव की खूबसूरत तस्वीर
विशेष रिपोर्ट | श्यामल प्रतीक | रक्सौल अनुमंडल रिपोर्टर
चाणक्य न्यूज़ इंडिया
मोतिहारी। सरहद वही थी। रास्ते भी वही थे। गांव भी वही थे।
लेकिन शुक्रवार को तस्वीर कुछ अलग थी।
जिन रास्तों पर हर दिन सीमा की सुरक्षा में सशस्त्र सीमा बल के जवानों के कदम पड़ते हैं, उन्हीं रास्तों पर आज स्कूली बच्चों के हाथों में तिरंगा लहरा रहा था। गांव के बुजुर्ग, महिलाएं, युवा, शिक्षक और जनप्रतिनिधि साथ चल रहे थे और वातावरण में बार-बार ‘वन्दे मातरम्’ का स्वर गूंज रहा था।
स्वतंत्रता दिवस-2026 की पूर्व संध्या पर भारत-नेपाल सीमा से सटे इस इलाके ने मानो तिरंगे को अपने भीतर उतार लिया।
यह दृश्य 71वीं वाहिनी सशस्त्र सीमा बल, मोतिहारी द्वारा ‘हर घर तिरंगा-2026’ अभियान के अंतर्गत समवाय अठमोहन के कार्यक्षेत्र स्थित VVP-II बिजबनी में आयोजित भव्य तिरंगा एवं वन्दे मातरम् रैली का था।
जब सीमा प्रहरी के साथ कदम से कदम मिलाकर चला गांव
रैली में श्री निशित कुमार उज्ज्वल (भा.पु.से.), महानिरीक्षक, सशस्त्र सीमा बल, सीमांत मुख्यालय पटना तथा श्री सरोज कुमार ठाकुर (भा.पु.से.), उप-महानिरीक्षक, सशस्त्र सीमा बल, क्षेत्रक मुख्यालय मुजफ्फरपुर की गरिमामयी उपस्थिति रही।
महानिरीक्षक निशित कुमार उज्ज्वल ने हरी झंडी दिखाकर रैली को रवाना किया।
इसके बाद सैनिक रोड, अठमोहन से शुरू हुआ तिरंगे का यह कारवां बड़हरवा और महुअवा होते हुए बेलदरवा मठ की ओर बढ़ चला।
रैली आगे बढ़ती रही और उसके साथ बढ़ता गया लोगों का उत्साह।
कहीं बच्चों के छोटे-छोटे हाथों में तिरंगा था, कहीं ग्रामीणों के कदम जवानों के कदमों से मिल रहे थे और कहीं ‘वन्दे मातरम्’ की गूंज स्वतंत्रता दिवस के उत्साह को और गहरा कर रही थी।
“तिरंगा हमारी आन, बान और शान”
महानिरीक्षक निशित कुमार उज्ज्वल ने उपस्थित जनप्रतिनिधियों, ग्रामीणों, पुलिस एवं जिला प्रशासन के अधिकारियों, SSB जवानों, शिक्षकों तथा छात्र-छात्राओं को संबोधित करते हुए राष्ट्रीय ध्वज के महत्व को रेखांकित किया।
उन्होंने कहा कि तिरंगा देश की आन, बान और शान का प्रतीक है।
उन्होंने लोगों से ‘हर घर तिरंगा’ अभियान को जनभागीदारी का राष्ट्रीय अभियान बनाने और अपने घरों पर पूरे सम्मान के साथ राष्ट्रीय ध्वज फहराने का आह्वान किया।
बच्चों के हाथ का तिरंगा सबसे खूबसूरत तस्वीर
इस पूरी रैली में सबसे प्रभावशाली तस्वीर उन छात्र-छात्राओं की रही, जो राष्ट्रीय ध्वज लेकर आगे बढ़ रहे थे।
क्योंकि तिरंगा जब किसी बच्चे के हाथ में पहुंचता है, तो वह केवल कपड़े से बना राष्ट्रीय ध्वज नहीं रह जाता—वह अगली पीढ़ी को सौंपे जा रहे देश के इतिहास, स्वतंत्रता के संघर्ष, जिम्मेदारी और राष्ट्रीय एकता के मूल्यों का प्रतीक बन जाता है।
आज सीमा पर तैनात जवानों के साथ चल रहे यही बच्चे कल देश के अलग-अलग क्षेत्रों में अपनी जिम्मेदारियां संभालेंगे।
और शायद वर्षों बाद भी उन्हें याद रहेगा कि स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर वे अपने गांव की सड़क पर देश के सीमा प्रहरियों के साथ हाथ में तिरंगा लेकर चले थे।
71वीं वाहिनी: सरहद की चौकसी से गांवों के विश्वास तक
भारत-नेपाल की खुली सीमा पर SSB की जिम्मेदारी बेहद महत्वपूर्ण है। लेकिन 71वीं वाहिनी की गतिविधियों में सुरक्षा के साथ-साथ सीमावर्ती समाज से जुड़ाव का पक्ष भी लगातार दिखाई देता है।
कभी ग्रामीणों के बीच जागरूकता, कभी विद्यार्थियों से संवाद, कभी सामाजिक कार्यक्रम और अब स्वतंत्रता दिवस से पहले गांव-गांव तक तिरंगे का संदेश।
ऐसी पहल एक महत्वपूर्ण बात समझाती है—
सीमा की सुरक्षा केवल सीमा स्तंभों की निगरानी से मजबूत नहीं होती; वह तब और मजबूत होती है जब सीमा प्रहरी और सीमावर्ती नागरिकों के बीच भरोसा कायम होता है।
और शुक्रवार की रैली में यही भरोसा तिरंगा लेकर सड़कों पर चलता दिखाई दिया।
✍️ श्यामल प्रतीक की कलम से | तिरंगे के पीछे एक एहसास
मैं इस रैली को केवल स्वतंत्रता दिवस से पहले आयोजित एक कार्यक्रम के रूप में नहीं देखता।
मेरे लिए इसकी सबसे खूबसूरत तस्वीर वह बच्चा है, जिसके हाथ में तिरंगा है और जिसके साथ देश की सीमा की रक्षा करने वाला जवान चल रहा है।
एक तरफ वह पीढ़ी है जो आज सरहद की जिम्मेदारी संभाल रही है, और दूसरी तरफ वह पीढ़ी है जिसे कल इस देश की जिम्मेदारी संभालनी है।
इन दोनों पीढ़ियों के बीच आज तिरंगा खड़ा था।
शायद राष्ट्रप्रेम की सबसे सरल परिभाषा भी यही है—अपने देश से प्रेम करना, उसके प्रतीकों का सम्मान करना और अपनी जिम्मेदारी को ईमानदारी से निभाना।
जब भारत-नेपाल सीमा से सटे गांवों की गलियों में बच्चे, ग्रामीण, शिक्षक, प्रशासन और SSB के जवान एक साथ तिरंगा लेकर निकलते हैं, तो यह केवल एक रैली नहीं रह जाती।
यह सरहद का अपने राष्ट्र से संवाद बन जाती है।
और इसीलिए आज की तस्वीर को मैं कुछ शब्दों में यूं देखता हूं—
सरहद पर पहरा भी है,
सरहद पर विश्वास भी है।
हाथों में तिरंगा है,
और दिल में हिन्दुस्तान भी है।
यही शायद 71वीं वाहिनी के उस भाव को सबसे बेहतर तरीके से व्यक्त करता है—
“इकहतर सबसे बेहतर”
जय हिन्द।
