बर्फीली चट्टानों पर नंगे पांव चढ़ा वह योद्धा, जिसने कारगिल में लिखी साहस की अमिट कहानी

🇮🇳 कारगिल: श्यामल प्रतीक की नज़र से

कैप्टन नेइकेझाकुओ केंगुरुसे — नागालैंड का वह वीर, जिसकी कहानी बताती है कि मातृभूमि की रक्षा में भारत की हर दिशा एक साथ खड़ी होती है

विशेष कवर स्टोरी | श्यामल प्रतीक | रक्सौल अनुमंडल रिपोर्टर

कारगिल की ऊंची और दुर्गम चोटियां केवल युद्ध का मैदान नहीं थीं। वर्ष 1999 में वे भारतीय सैनिकों के साहस, संकल्प और सर्वोच्च बलिदान की साक्षी बनीं। उन्हीं वीर सैनिकों में एक नाम था—कैप्टन नेइकेझाकुओ केंगुरुसे, जिन्हें उनके साथी प्यार से “नींबू साहब” भी कहते थे।

नागालैंड की धरती से निकला यह युवा अधिकारी कारगिल युद्ध में 2 राजपूताना राइफल्स के साथ लड़ते हुए देश के लिए सर्वोच्च बलिदान दे गया। उनकी वीरता के लिए उन्हें मरणोपरांत महावीर चक्र से सम्मानित किया गया।

शिक्षक से सेना के अधिकारी तक का सफर

कैप्टन केंगुरुसे का जन्म 15 जुलाई 1974 को नागालैंड के कोहिमा जिले के नेरहेमा गांव में हुआ था।

सेना में आने से पहले उन्होंने कुछ समय शिक्षक के रूप में भी कार्य किया। लेकिन उनके भीतर देश की सेवा का एक अलग संकल्प था। यही संकल्प उन्हें भारतीय सेना तक ले गया।

वे 12 दिसंबर 1998 को भारतीय सेना में कमीशन हुए। शायद उस समय किसी ने नहीं सोचा होगा कि कुछ ही महीनों बाद यह युवा अधिकारी भारतीय सैन्य इतिहास में अपनी वीरता की अमिट छाप छोड़ जाएगा।

कारगिल युद्ध और एक कठिन जिम्मेदारी

1999 में पाकिस्तान की ओर से हुई घुसपैठ के बाद कारगिल की चोटियों को वापस लेने के लिए भारतीय सेना ने ऑपरेशन विजय शुरू किया।

दुश्मन ऊंची चोटियों पर मजबूत स्थिति में था। भारतीय जवानों को नीचे से खड़ी पहाड़ियों और कठिन चट्टानों को पार करते हुए आगे बढ़ना था।

इसी युद्ध के दौरान कैप्टन केंगुरुसे को एक बेहद चुनौतीपूर्ण अभियान की जिम्मेदारी मिली। वे अपनी घातक प्लाटून का नेतृत्व कर रहे थे।

उनका लक्ष्य दुश्मन की मजबूत स्थिति को निष्क्रिय करना था।

जब जूते उतारकर चट्टान पर चढ़ गए केंगुरुसे

यह उनकी वीरता का सबसे प्रसिद्ध प्रसंग है।

अत्यधिक ठंड और कठिन परिस्थितियों के बीच लक्ष्य तक पहुंचने के रास्ते में एक खड़ी चट्टान बड़ी बाधा बन गई। चट्टान पर पकड़ बनाना बेहद मुश्किल था।

ऐसी स्थिति में कैप्टन केंगुरुसे ने अपने जूते उतार दिए ताकि चट्टान पर बेहतर पकड़ बनाई जा सके।

हड्डियां जमा देने वाली ठंड के बावजूद वे आगे बढ़ते रहे।

दुश्मन की गोलीबारी के बीच उन्होंने अपने साथियों का नेतृत्व किया और शत्रु की स्थिति के बेहद करीब पहुंच गए। आधिकारिक वीरता विवरण के अनुसार उन्होंने अदम्य साहस दिखाते हुए दुश्मन के सैनिकों को मार गिराया और अभियान को निर्णायक दिशा दी।

लेकिन इस संघर्ष में वे गंभीर रूप से घायल हुए और 28 जून 1999 को मातृभूमि की रक्षा करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए।

उनकी उम्र मात्र 24 वर्ष थी।

महावीर चक्र से सम्मानित

कैप्टन केंगुरुसे के असाधारण साहस और कर्तव्यनिष्ठा को राष्ट्र ने सलाम किया।

उन्हें मरणोपरांत भारत के दूसरे सर्वोच्च युद्धकालीन वीरता पुरस्कार महावीर चक्र से सम्मानित किया गया।

यह सम्मान केवल एक सैनिक की वीरता का प्रतीक नहीं है, बल्कि उस संकल्प का सम्मान है जिसमें एक जवान राष्ट्र के लिए अपने जीवन से भी आगे कर्तव्य को रखता है।
नागालैंड से कारगिल तक—एक भारत की कहानी

कैप्टन केंगुरुसे की कहानी का एक और महत्वपूर्ण संदेश है।
वे पूर्वोत्तर भारत के नागालैंड से आए थे और हजारों किलोमीटर दूर जम्मू-कश्मीर की बर्फीली चोटियों पर भारत की रक्षा करते हुए शहीद हुए।

कारगिल ने साबित किया कि भारतीय सैनिक की पहचान उसकी भाषा, क्षेत्र या राज्य से नहीं होती—उसकी सबसे बड़ी पहचान उसकी वर्दी और तिरंगा होता है।

उत्तर हो या दक्षिण, पूर्व हो या पश्चिम—सीमा पर खड़ा सैनिक पूरे भारत का प्रतिनिधित्व करता है।

कारगिल केवल इतिहास नहीं, आने वाली पीढ़ियों के लिए पाठ है

आज जब हम कैप्टन नेइकेझाकुओ केंगुरुसे को याद करते हैं, तो केवल उनके बलिदान को याद करना पर्याप्त नहीं है।
उनकी कहानी नई पीढ़ी तक पहुंचनी चाहिए।

एक शिक्षक से सेना अधिकारी बने 24 वर्षीय युवक ने परिस्थितियों के सामने हार स्वीकार नहीं की। दुर्गम पहाड़, जमा देने वाली ठंड और सामने मजबूत दुश्मन—इनमें से कोई बाधा उन्हें अपने कर्तव्य से पीछे नहीं हटा सकी।

यही कारण है कि कारगिल युद्ध के 27 वर्ष बाद भी कैप्टन केंगुरुसे का नाम भारतीय सैन्य इतिहास में सम्मान के साथ लिया जाता है।

श्यामल प्रतीक की कलम से

“शहीदों की कहानियां केवल युद्ध के पन्नों में सुरक्षित रखने के लिए नहीं होतीं। उन्हें नई पीढ़ी तक पहुंचाना इसलिए जरूरी है, ताकि वह समझ सके कि आज जिस तिरंगे को हम स्वतंत्र आकाश में लहराते देखते हैं, उसकी गरिमा की रक्षा के लिए कितने जवानों ने अपना आज हमारे कल के नाम कर दिया। कैप्टन केंगुरुसे की कहानी भारत की उसी सामूहिक चेतना की कहानी है—जहां नागालैंड का एक बेटा कारगिल की चोटियों पर पूरे देश के लिए लड़ता है।”

🇮🇳 कैप्टन नेइकेझाकुओ केंगुरुसे

जन्म: 15 जुलाई 1974
गृह राज्य: नागालैंड
यूनिट: 2 राजपूताना राइफल्स
ऑपरेशन: ऑपरेशन विजय — कारगिल युद्ध, 1999
वीरगति: 28 जून 1999
वीरता सम्मान: महावीर चक्र (मरणोपरांत)

श्रद्धांजलि उन सभी कारगिल वीरों को, जिनके साहस और बलिदान ने तिरंगे की आन को हिमालय की चोटियों पर कायम रखा।

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