🇮🇳🇳🇵 कारगिल: श्यामल प्रतीक की नज़र से
1/11 गोरखा राइफल्स के राइफलमैन कालू राम राय की कहानी केवल कारगिल के रण की नहीं; यह गोरखा सैन्य परंपरा और भारत-नेपाल के उन ऐतिहासिक जन-संबंधों की भी कहानी है, जिनकी कुछ कड़ियां कर्तव्य, विश्वास और सर्वोच्च बलिदान से बनी हैं
विशेष कवर स्टोरी | श्यामल प्रतीक
भारत और नेपाल के बीच एक अंतरराष्ट्रीय सीमा है, लेकिन दोनों देशों के रिश्तों की कहानी उस सीमा से कहीं पुरानी और कहीं अधिक गहरी है।
कहीं यह रिश्ता संस्कृति और आस्था में दिखाई देता है, कहीं भाषा और परंपराओं में। कहीं दोनों ओर बसे परिवार इसे जीवित रखते हैं, तो कहीं पीढ़ियों पुरानी गोरखा सैनिक परंपरा इसकी एक अलग ऐतिहासिक पहचान बनाती है।
इसी इतिहास का एक अत्यंत भावुक और गौरवपूर्ण अध्याय 1999 के कारगिल युद्ध की दुर्गम चोटियों पर लिखा गया।
उस अध्याय में एक नाम था—
राइफलमैन कालू राम राय
1/11 गोरखा राइफल्स
नेपाल की धरती पर जन्मे इस युवा ने भारतीय सेना की वर्दी पहनी और अंततः कारगिल की खालूबार चोटी पर अपने सैन्य कर्तव्य का निर्वहन करते हुए सर्वोच्च बलिदान दिया।
उनकी कहानी एक सैनिक की वीरगाथा तो है ही, साथ ही यह उस ऐतिहासिक गोरखा सैन्य परंपरा की स्मृति भी है, जिसने हिमालय के दोनों ओर बसे समाजों को पीढ़ियों से एक विशिष्ट मानवीय संबंध में जोड़ा है।
नेपाल के गांव से कारगिल की चोटियों तक
उपलब्ध सैन्य-स्मृति अभिलेखों के अनुसार राइफलमैन कालू राम राय नेपाल के दिक्तेल क्षेत्र के मखवाला गांव से थे। उनकी माता का नाम हरका माया राय बताया गया है। स्कूली शिक्षा के बाद उन्होंने सैनिक जीवन चुना और भारतीय सेना की 1/11 गोरखा राइफल्स का हिस्सा बने।
उस समय शायद उनके गांव में किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी कि इसी मिट्टी से निकला एक बेटा हजारों फीट ऊंची कारगिल की चोटियों तक पहुंचेगा और इतिहास में अपना नाम दर्ज करा जाएगा।
लेकिन सैनिक का जीवन भविष्य की आसान राह नहीं चुनता।
वह कर्तव्य की राह चुनता है।
और कालू राम राय की वह राह उन्हें खालूबार तक ले गई।
जब खालूबार ने गोरखा वीरों की परीक्षा ली
1999 के कारगिल युद्ध में बटालिक सेक्टर का खालूबार क्षेत्र सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण रणक्षेत्र बन गया था।
दुर्गम पहाड़, अत्यधिक ऊंचाई और कठिन परिस्थितियां—हर कदम सैनिकों की परीक्षा ले रहा था।
इसी क्षेत्र में 1/11 गोरखा राइफल्स को महत्वपूर्ण सैन्य जिम्मेदारी सौंपी गई।
राइफलमैन कालू राम राय बटालियन की ‘बी’ कंपनी की प्लाटून नंबर 5 का हिस्सा थे। इस प्लाटून का नेतृत्व कैप्टन मनोज कुमार पांडेय कर रहे थे, जिन्हें खालूबार में प्रदर्शित असाधारण वीरता के लिए बाद में मरणोपरांत भारत के सर्वोच्च सैन्य सम्मान परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया।
2 और 3 जुलाई 1999 की रात भारतीय सैनिक अत्यंत कठिन परिस्थितियों में खालूबार की ओर बढ़े।
घंटों की कठिन चढ़ाई के बाद सैनिक लक्ष्य के करीब पहुंचे। सामने भारी प्रतिरोध था, लेकिन टुकड़ी आगे बढ़ती रही।
खालूबार की लड़ाई भारतीय सैन्य इतिहास में साहस, नेतृत्व और सैनिक संकल्प के सबसे उल्लेखनीय अध्यायों में दर्ज हुई।
इसी भीषण संघर्ष में राइफलमैन कालू राम राय गंभीर रूप से घायल हुए और 3 जुलाई 1999 को वीरगति को प्राप्त हुए।
एक सैनिक का जीवन समाप्त हुआ—
लेकिन एक वीरगाथा शुरू हो गई।
🇳🇵 जन्मभूमि नेपाल, 🇮🇳 सैन्य कर्तव्य भारत के लिए
कालू राम राय की कहानी का यह पक्ष इसे विशेष बनाता है।
जन्मभूमि नेपाल थी।
वर्दी भारतीय सेना की थी।
और सर्वोच्च बलिदान कारगिल की रणभूमि पर हुआ।
यहां ऐतिहासिक तथ्य को स्पष्ट रखना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
कारगिल युद्ध में नेपाल एक राष्ट्र के रूप में भारत की ओर से युद्धरत पक्ष नहीं था। नेपाल में जन्मे अथवा नेपाल से जुड़े गोरखा सैनिक भारतीय सेना के सैनिकों के रूप में अपने सैन्य दायित्व का निर्वहन कर रहे थे।
इसी तथ्य के भीतर भारत-नेपाल संबंधों की एक असाधारण मानवीय कहानी छिपी है।
यह किसी राजनीतिक घोषणा से बना संबंध नहीं था।
इसके पीछे पीढ़ियों पुरानी सैनिक परंपरा, सेवा, विश्वास और कर्तव्य की विरासत थी।
खालूबार पर केवल कालू राम नहीं थे
खालूबार की विजय की कीमत बहुत बड़ी थी।
इस अभियान में कैप्टन मनोज कुमार पांडेय सहित 1/11 गोरखा राइफल्स के कई वीरों ने सर्वोच्च बलिदान दिया।
इन्हीं वीरों में हवलदार गंगा राम राय, हवलदार भीम बहादुर दीवान, राइफलमैन कर्ण बहादुर लिम्बू और राइफलमैन कालू राम राय जैसे नाम भी शामिल हैं।
अलग-अलग घर।
अलग-अलग गांव।
अलग-अलग परिवार।
लेकिन खालूबार की ऊंचाइयों पर उनकी पहचान एक थी
सैनिक।
उनका लक्ष्य एक था—
अपने सैन्य कर्तव्य को पूरा करना।
और आवश्यकता पड़ने पर उसके लिए जीवन तक समर्पित कर देना।
🇮🇳🤝🇳🇵 भारत-नेपाल संबंधों का वह अध्याय, जिसे रणभूमि ने अमर कर दिया
भारत और नेपाल के संबंधों की चर्चा होती है तो खुली सीमा, व्यापार, धार्मिक-सांस्कृतिक संबंध, पर्यटन और दोनों ओर बसे परिवारों का उल्लेख स्वाभाविक है।
लेकिन इस रिश्ते के इतिहास में गोरखा सैनिक परंपरा की भी अपनी विशिष्ट जगह है।
राजनीतिक परिस्थितियां बदल सकती हैं।
सरकारें बदल सकती हैं।
पड़ोसी देशों के बीच किसी विषय पर अलग-अलग दृष्टिकोण भी हो सकते हैं।
लेकिन इतिहास में दिया गया बलिदान नहीं बदलता।
कारगिल की चोटियों पर गोरखा सैनिकों द्वारा निभाया गया सैन्य कर्तव्य इसी इतिहास का हिस्सा है।
इसीलिए कालू राम राय जैसे वीरों की कहानी हमें भारत और नेपाल के संबंधों को केवल कूटनीति की दृष्टि से नहीं, बल्कि लोगों, परिवारों, परंपराओं और साझा ऐतिहासिक स्मृतियों की दृष्टि से भी देखने का अवसर देती है।
एक मां नेपाल में थी, बेटा खालूबार की ऊंचाइयों पर
युद्ध के इतिहास में हम अक्सर सैन्य नक्शे देखते हैं।
चोटियों के नाम पढ़ते हैं।
रेजिमेंट और बटालियन की चर्चा करते हैं।
लेकिन हर वर्दी के पीछे एक घर होता है।
हर सैनिक के पीछे एक परिवार होता है।
और हर बलिदान के पीछे किसी मां, पिता, पत्नी, भाई, बहन या बच्चे की एक ऐसी स्मृति होती है जो जीवन भर उनके साथ रहती है।
कालू राम राय के पीछे भी नेपाल में एक परिवार था।
एक साधारण गांव से निकला वह बेटा भारतीय सेना की वर्दी पहनकर खालूबार की कठिन ऊंचाइयों तक पहुंच चुका था।
उस निर्णायक क्षण में उसके सामने केवल उसका सैन्य कर्तव्य था।
और उसने उस कर्तव्य को अपने जीवन से बड़ा माना।
3 जुलाई 1999 को कालू राम राय वापस नहीं लौटे।
लेकिन उनका नाम इतिहास में लौट आया—
हमेशा के लिए।
खालूबार आज शांत है, लेकिन इतिहास अब भी बोलता है
आज खालूबार की चोटियां शांत हैं।
1999 का युद्ध समाप्त हुए वर्षों बीत चुके हैं।
नई पीढ़ियां सामने आ चुकी हैं।
लेकिन इतिहास की स्मृति में राइफलमैन कालू राम राय आज भी जीवित हैं।
नेपाल की धरती का बेटा।
भारतीय सेना का गोरखा सैनिक।
और कारगिल की रणभूमि का अमर वीर।
उनकी कहानी बताती है कि कुछ रिश्ते केवल राजधानियों के बीच नहीं बनते।
कुछ रिश्ते गांवों से शुरू होते हैं।
कुछ सैनिक छावनियों में मजबूत होते हैं।
और कुछ रणभूमि में ऐसी परीक्षा से गुजरते हैं कि इतिहास उन्हें हमेशा के लिए अपनी स्मृति में दर्ज कर लेता है।
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🇳🇵 गोर्खाली वीरहरूप्रति सम्मान
«“वीर गोर्खालीको साहस सीमाले कहिल्यै बाँध्न सक्दैन।
कारगिलका हिमाली चुचुराहरूमा बगेको उनीहरूको रगत आज पनि त्याग, कर्तव्य र वीरताको अमर गाथा बनेर जीवित छ।
ती अमर गोर्खाली वीरहरूप्रति शत्–शत् नमन।”»
हिंदी भावार्थ 🇮🇳
«“वीर गोरखाओं के साहस को सीमाएं कभी बांध नहीं सकतीं।
कारगिल की हिमालयी चोटियों पर बहा उनका रक्त आज भी त्याग, कर्तव्य और वीरता की अमर गाथा बनकर जीवित है।
उन अमर गोरखा वीरों को शत्-शत् नमन।”»
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श्यामल प्रतीक की कलम से
कारगिल की कहानी लिखते हुए हम उन चोटियों को याद करते हैं जिन पर विजय मिली।
लेकिन हमें उन गांवों को भी याद करना चाहिए, जहां से उन चोटियों तक पहुंचने वाले सैनिक निकले थे।
राइफलमैन कालू राम राय की यात्रा नेपाल के एक गांव से शुरू हुई और खालूबार की रणभूमि तक पहुंची।
इसलिए जब भारत और नेपाल के ऐतिहासिक जन-संबंधों की बात हो, तब कालू राम राय और उनके जैसे गोरखा वीरों की स्मृति को भी सम्मानपूर्वक स्थान मिलना चाहिए।
क्योंकि समझौते दो देशों के संबंधों को दिशा दे सकते हैं—
लेकिन साझा इतिहास उन संबंधों को गहराई देता है।
और कारगिल के खालूबार पर उस इतिहास का एक अध्याय साहस, कर्तव्य और सर्वोच्च बलिदान से लिखा गया था।
राइफलमैन कालू राम राय
1/11 गोरखा राइफल्स
ऑपरेशन विजय | कारगिल युद्ध 1999
खालूबार | बटालिक सेक्टर
बलिदान: 3 जुलाई 1999
शत्-शत् नमन। 🇮🇳🇳🇵
सरहदें राष्ट्रों की पहचान तय करती हैं, लेकिन वीरता और बलिदान की स्मृतियां उन सरहदों से बहुत आगे जाती हैं।
भारत और नेपाल—दो संप्रभु राष्ट्र, सदियों के जन-संबंध; और कारगिल उस इतिहास में गोरखा शौर्य से लिखा एक अविस्मरणीय अध्याय।
