कर्नल सोनम वांगचुक, महावीर चक्र — ‘लायन ऑफ लद्दाख’ की अमर वीरगाथा
विशेष कवर स्टोरी | श्यामल प्रतीक
रक्सौल अनुमंडल रिपोर्टर | चाणक्य न्यूज़ इंडिया
कारगिल की कहानी केवल उन वीरों की कहानी नहीं है जिन्होंने मातृभूमि के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया। यह उन योद्धाओं की कहानी भी है जो मौत को सामने देखकर आगे बढ़े, विजय हासिल की और आने वाली पीढ़ियों के लिए साहस की जीवित मिसाल बन गए।
ऐसे ही एक योद्धा थे कर्नल सोनम वांगचुक, महावीर चक्र।
वर्ष 1999।
लद्दाख की बर्फ से ढकी चोटियां युद्धभूमि में बदल रही थीं। ऊंचाई ऐसी जहां सांस लेना भी चुनौती थी। सामने दुश्मन ऊंची जगहों पर मौजूद था और भारतीय सैनिकों के सामने एक कठिन मिशन था।
इसी दौर में भारतीय सेना के एक अधिकारी ने अपने सैनिकों का नेतृत्व करते हुए इतिहास के पन्नों पर अपना नाम लिख दिया।
वह अधिकारी थे—तत्कालीन मेजर सोनम वांगचुक।
बटालिक की बर्फ में शुरू हुई वीरगाथा
30 मई 1999 को ऑपरेशन विजय के दौरान मेजर सोनम वांगचुक लद्दाख स्काउट्स की इंडस विंग की एक टुकड़ी का नेतृत्व कर रहे थे।
उनका मिशन बटालिक सेक्टर में नियंत्रण रेखा के निकट लगभग 5,500 मीटर ऊंचे ग्लेशियर क्षेत्र की रिजलाइन को सुरक्षित करना था। इस क्षेत्र पर नियंत्रण महत्वपूर्ण था, क्योंकि इससे आगे की घुसपैठ को रोका जा सकता था।
कठिन मौसम और दुर्गम भूभाग के बीच आगे बढ़ रही भारतीय टुकड़ी पर ऊंचाई से हमला हुआ। इस संघर्ष में लद्दाख स्काउट्स के एक जवान ने सर्वोच्च बलिदान दिया।
पर परिस्थितियों ने मेजर वांगचुक का संकल्प नहीं तोड़ा।
उन्होंने अपने सैनिकों को संगठित रखा और नेतृत्व करते हुए विरोधी स्थिति को निष्प्रभावी करने की कार्रवाई की। इसके बाद उन्होंने चोरबत ला अक्ष पर भारतीय स्थिति मजबूत करने और क्षेत्र को सुरक्षित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
🇮🇳 कारगिल की शुरुआती सफलताओं में एक बड़ा नाम
चोरबत ला की सफलता का महत्व केवल एक सैन्य स्थिति हासिल करने तक सीमित नहीं था।
यह उस समय आया जब कारगिल संघर्ष अपने शुरुआती और अत्यंत अनिश्चित दौर में था। पूर्व सेना प्रमुख जनरल वी.पी. मलिक की पुस्तक Kargil: From Surprise to Victory के उपलब्ध सरकारी संस्करण में भी चोरबत ला को सामरिक रूप से महत्वपूर्ण बताते हुए मेजर वांगचुक के नेतृत्व और भूमिका का उल्लेख किया गया है।
यही कारण है कि सोनम वांगचुक का नाम कारगिल युद्ध की शुरुआती महत्वपूर्ण सफलताओं के साथ जुड़ गया।
उनकी वीरता के लिए भारत ने उन्हें महावीर चक्र से सम्मानित किया—देश का दूसरा सर्वोच्च युद्धकालीन वीरता पुरस्कार।
और देश ने उन्हें कहा—‘लायन ऑफ लद्दाख’
सोनम वांगचुक की वीरता केवल युद्धभूमि तक सीमित कहानी नहीं बनी।
वे आगे चलकर ‘लायन ऑफ लद्दाख’ के नाम से प्रसिद्ध हुए।
कारगिल के बाद भी उन्होंने भारतीय सेना में सेवा जारी रखी और कर्नल के पद तक पहुंचे। उनका व्यक्तित्व यह याद दिलाता रहा कि नेतृत्व केवल आदेश देने का नाम नहीं—सबसे कठिन क्षण में अपने सैनिकों के साथ खड़े रहने का नाम है।
10 अप्रैल 2026 को कर्नल सोनम वांगचुक का निधन हो गया। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने श्रद्धांजलि देते हुए उनके साहस, नेतृत्व और कर्तव्य के प्रति अटूट प्रतिबद्धता को याद किया तथा उनके जीवन को आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बताया।
श्यामल प्रतीक की कलम से — विशेष श्रद्धांजलि
कारगिल की कहानियां लिखते समय मेरे सामने केवल युद्ध का इतिहास नहीं होता।
मेरे सामने उन सैनिकों का साहस होता है, जिन्होंने हिमालय की उन चोटियों पर खड़े होकर भारत की ओर बढ़ने वाले खतरे को चुनौती दी।
कर्नल सोनम वांगचुक की कहानी पढ़ते हुए मेरे मन में सबसे गहरी छवि उस अधिकारी की बनती है, जो अपने सैनिकों से आगे बढ़कर कहता नहीं, बल्कि अपने आचरण से दिखाता है—देश की रक्षा में नेतृत्व का अर्थ सबसे कठिन रास्ते पर सबसे आगे चलना है।
कारगिल में अनेक वीर मातृभूमि की रक्षा करते हुए अमर हो गए। कुछ वीर युद्ध से लौटे और जीवन भर अपने साथ उस युद्ध का इतिहास लेकर चले।
सोनम वांगचुक उन्हीं महान योद्धाओं में से एक थे।
वे कारगिल में शहीद नहीं हुए थे। इसलिए उन्हें शहीद कहना उनके वास्तविक इतिहास को बदल देना होगा। उनका सम्मान इस सत्य के साथ होना चाहिए कि वे कारगिल के विजयी योद्धा थे—जो बर्फीली चोटियों से लौटे और दशकों तक देश के सामने साहस की जीवित मिसाल बने रहे।
आज वे हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन चोरबत ला की चोटियां जब भी कारगिल की कहानी सुनाएंगी, उनमें एक नाम जरूर गूंजेगा—
कर्नल सोनम वांगचुक।
लायन ऑफ लद्दाख।
महावीर चक्र।
और उस नाम के सामने मेरा सिर हमेशा सम्मान से झुका रहेगा।
जय हिंद। 🇮🇳
— श्यामल प्रतीक
रक्सौल अनुमंडल रिपोर्टर
चाणक्य न्यूज़ इंडिया
