“ये दिल माँगे मोर” — जब एक बेटे ने अपनी साँसों से तिरंगे की उम्र बढ़ा दी

कारगिल: श्यामल प्रतीक की नज़र से

अध्याय–4

विशेष श्रृंखला | श्यामल प्रतीक

“कुछ लोग जीवन जीते हैं… और कुछ लोग अपना जीवन इस तरह जीते हैं कि उनके जाने के बाद भी पूरा राष्ट्र उन्हें अपना आदर्श बना लेता है।”

जुलाई 1999…

कारगिल की बर्फीली चोटियाँ बारूद की गंध से भर चुकी थीं। हर ओर गोलियों की आवाज़ थी। ऑक्सीजन कम थी, लेकिन भारतीय सैनिकों का हौसला आसमान से भी ऊँचा था।

इन्हीं चोटियों के बीच एक युवा अधिकारी था—कैप्टन विक्रम बत्रा।

उसकी उम्र बहुत बड़ी नहीं थी, लेकिन उसका साहस हिमालय से भी ऊँचा था। उसके लिए वर्दी केवल कपड़ा नहीं थी; वह भारत माता की शपथ थी।

जब उसने दुश्मन की चौकी पर विजय प्राप्त की, तब रेडियो पर उसके शब्द गूँजे—

“ये दिल माँगे मोर!”

यह केवल एक वाक्य नहीं था। यह उस भारतीय सैनिक की आत्मा की आवाज़ थी, जो विजय मिलने के बाद भी अगले मोर्चे की ओर बढ़ने को तैयार था।

लेकिन नियति ने उसके लिए कुछ और ही लिखा था।

पॉइंट 4875 की लड़ाई अपने सबसे कठिन दौर में थी। गोलियाँ लगातार चल रही थीं। तभी एक साथी अधिकारी घायल होकर दुश्मन की फायरिंग के बीच फँस गया।

कैप्टन विक्रम बत्रा चाहते तो सुरक्षित स्थान पर रह सकते थे। कोई उन्हें दोष नहीं देता। लेकिन भारतीय सेना अपने सैनिकों को कभी पीछे छोड़ना नहीं सिखाती।

उन्होंने बिना अपनी जान की परवाह किए आगे बढ़ने का निर्णय लिया।

साथी को बचाने की कोशिश करते हुए दुश्मन की गोलियाँ उनके सीने में लगीं।

उस क्षण एक सैनिक गिरा…

लेकिन भारत का मस्तक और ऊँचा हो गया।

उनकी साँसें थम गईं, पर उनकी आवाज़ आज भी हर भारतीय के हृदय में गूँजती है—

“ये दिल माँगे मोर।”

क्या हम कभी उनका दर्द समझ पाएँगे?

जब किसी शहीद के घर तिरंगे में लिपटा ताबूत पहुँचता है, तब केवल एक सैनिक नहीं लौटता—

एक माँ का बेटा लौटता है।

एक पिता का सहारा लौटता है।

एक बहन का भाई लौटता है।

एक मित्र की मुस्कान लौटती है…

लेकिन अब हमेशा के लिए मौन।

हम हर वर्ष कारगिल विजय दिवस मनाते हैं।

दो मिनट का मौन भी रखते हैं।

लेकिन क्या दो मिनट का मौन उस माँ की बरसों की प्रतीक्षा लौटा सकता है?

क्या कोई सम्मान उस पिता की खाली आँखों को फिर से चमका सकता है?

क्या कोई पदक उस बच्चे को उसके पिता की उँगली फिर से पकड़वा सकता है?

शायद नहीं…

लेकिन हम इतना अवश्य कर सकते हैं—

उनके बलिदान को कभी भुलाएँ नहीं।

कैप्टन विक्रम बत्रा केवल एक नाम नहीं हैं

वे उस भारत का प्रतीक हैं जो कभी झुकता नहीं।

वे उस तिरंगे की शान हैं, जिसके लिए लाखों सैनिक आज भी सीमा पर डटे हैं।

वे उस विश्वास का नाम हैं कि जब तक भारत के पास ऐसे बेटे हैं, तब तक कोई दुश्मन उसकी ओर आँख उठाकर नहीं देख सकता।

भारत सरकार ने उनके अद्वितीय साहस और सर्वोच्च बलिदान के लिए उन्हें परम वीर चक्र से सम्मानित किया।

लेकिन सच्चाई यह है कि—

उनका सबसे बड़ा सम्मान करोड़ों भारतीयों के दिलों में आज भी जीवित है।

श्रद्धांजलि

“हे भारत के अमर वीर…
आपने अपने आज को हमारे कल के लिए समर्पित कर दिया।
जब भी तिरंगा हवा में लहराता है, उसमें आपकी साँसें महसूस होती हैं।
जब भी कोई बच्चा राष्ट्रगान गाता है, उसमें आपकी मुस्कान दिखाई देती है।
और जब भी कोई सैनिक सीमा पर खड़ा होता है, उसकी आँखों में आपका साहस जीवित रहता है।
भारत आपको कभी नहीं भूलेगा।”

जय हिन्द।

— श्यामल प्रतीक
विशेष श्रृंखला : कारगिल – वीरता, बलिदान और भारत की अमर विजय की अनकही दास्तान

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