एक सरहद ने मुल्क बाँट दिया, मगर यादें नहीं बाँट सकी; सीमांत गांधी की छोटी-सी गठरी आज भी पूछती है—आखिर सत्ता और सियासत की कीमत आम इंसान ही क्यों चुकाता है?
विशेष रिपोर्ट | श्यामल प्रतीक
भारत और पाकिस्तान का बँटवारा इतिहास की महज़ एक घटना नहीं था। वह लाखों इंसानों की जिंदगी में आया ऐसा तूफान था, जिसने घर, रिश्ते, दोस्ती, पहचान और सदियों पुरानी स्मृतियों को एक झटके में सरहद के दो ओर कर दिया।
किसी को अपना पुश्तैनी घर छोड़ना पड़ा, किसी से उसका परिवार बिछड़ गया। कोई जिस गली में पैदा हुआ था, अचानक उसी मिट्टी से दूर हो गया। लाखों लोगों को विस्थापन झेलना पड़ा और सांप्रदायिक हिंसा में भारी संख्या में जानें गईं।
लेकिन बँटवारे का दर्द शायद केवल आँकड़ों से कभी नहीं समझा जा सकता।
उसे समझने के लिए कभी-कभी किसी एक इंसान की कहानी काफी होती है।
और ऐसी ही एक कहानी है ख़ान अब्दुल ग़फ्फ़ार ख़ान, यानी बादशाह ख़ान की—वही बादशाह ख़ान जिन्हें दुनिया महात्मा गांधी के बेहद करीबी सहयोगी, अहिंसा के योद्धा और “सीमांत गांधी” के रूप में जानती है।
एक बादशाह और उसकी छोटी-सी पोटली
बादशाह ख़ान अपने साथ कपड़े की एक छोटी-सी गठरी रखा करते थे।
देखने वाले के लिए वह मामूली पोटली थी। लेकिन बादशाह ख़ान के जीवन को जानने के बाद वह केवल सामान रखने की गठरी नहीं लगती।
वह उनकी सादगी की पहचान थी।
और शायद समय के साथ वह उस व्यक्ति की स्मृतियों का प्रतीक भी बन गई, जिसने अंग्रेजी शासन के खिलाफ संघर्ष किया, गांधी के साथ अहिंसा का रास्ता अपनाया और फिर उसी उपमहाद्वीप को अपनी आँखों के सामने बँटते देखा।
साल था 1969।
महात्मा गांधी की जन्म शताब्दी का अवसर था। बादशाह ख़ान भारत आए। उनके हाथ में वही पुरानी पोटली थी।
एक प्रचलित विवरण के अनुसार, हवाई अड्डे पर इंदिरा गांधी ने सम्मानपूर्वक उनसे वह गठरी लेने की पेशकश की।
बादशाह ख़ान कुछ पल ठहरे और शांत स्वर में बोले—
“यही तो बचा है, इसे भी ले लोगी?”
शब्द बहुत छोटे थे।
लेकिन उनका अर्थ शायद बहुत बड़ा था।
उस एक वाक्य को बँटवारे की पृष्ठभूमि में पढ़िए तो जैसे एक पूरी पीढ़ी का दर्द सामने खड़ा हो जाता है।
एक ऐसा व्यक्ति जिसने आजादी की लड़ाई में अपना जीवन लगा दिया, जेलें देखीं, संघर्ष किया और गांधी के अहिंसक भारत का सपना देखा—लेकिन स्वतंत्रता के साथ आए विभाजन ने उसकी राजनीतिक और भौगोलिक दुनिया ही बदल दी।
कहानी के अनुसार उस क्षण इंदिरा गांधी और जयप्रकाश नारायण भावुक हो गए।
क्योंकि शायद बात उस छोटी-सी पोटली की नहीं थी।
बात उस सबकी थी, जो पीछे छूट चुका था।
बँटवारा शायद यही होता है…
बँटवारा केवल नक्शे पर खींची गई लकीर नहीं होता।
घर वहीं रहता है।
आँगन वहीं रहता है।
वह पेड़ वहीं रहता है जिसके नीचे बचपन बीता था।
पुरखों की मिट्टी भी वहीं रहती है।
बदलता केवल नक्शा है—और नक्शे की एक लकीर अचानक इंसान से कह देती है कि उस पार की मिट्टी तुम्हारी यादों में तो तुम्हारी है, लेकिन अब वह दूसरे देश में है।
सरहद जमीन पर खींची जाती है, लेकिन उसका सबसे गहरा निशान इंसान के दिल पर पड़ता है।
वर्षों बाद भी वही पोटली
फिर आया 1985।
कांग्रेस स्थापना शताब्दी के अवसर पर तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के निमंत्रण पर बादशाह ख़ान भारत आए।
और बताया जाता है कि उनके हाथ में एक बार फिर वही पोटली थी।
प्रचलित कथा के अनुसार, राजीव गांधी ने आदरपूर्वक उसे देखने की इच्छा जताई। बादशाह ख़ान ने अपने सहज अंदाज में अनुमति दे दी।
पोटली खोली गई।
उसमें कोई दौलत नहीं थी।
न सोना।
न चाँदी।
न कोई बेशकीमती वस्तु।
बस दो जोड़ी लाल कुर्ता-पाजामा।
जिस इंसान को दुनिया “बादशाह” कहती थी, उसके पास अपने लिए इतना ही सामान था।
लेकिन दुनिया को देने के लिए उसके पास अहिंसा, भाईचारे, साहस और इंसानियत की पूरी विरासत थी।
1987 में भारत सरकार ने बादशाह ख़ान को देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया।
उनकी जिंदगी सत्ता और वैभव की कहानी नहीं बनी।
वह त्याग, सब्र और सादगी की कहानी बना
मेरा नज़रिया | श्यामल प्रतीक
मेरे लिए भारत का बँटवारा इतिहास की किताब में दर्ज कोई सामान्य राजनीतिक घटना नहीं है।
यह इंसानियत के सीने पर लगा वह ज़ख्म है, जिसकी टीस पीढ़ियों बाद भी महसूस की जा सकती है।
जब मैं बँटवारे की तस्वीरें देखता हूँ—अपना थोड़ा-सा सामान उठाए अनजान रास्तों पर चलते परिवार, पीछे छूटते घर और अपनों से बिछड़ते लोग—तो मेरे मन में बार-बार एक सवाल उठता है:
आखिर सत्ता, राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं और स्वार्थों की कीमत आम इंसान ही क्यों चुकाता है?
1947 की राजनीति, उसके कारणों और अलग-अलग नेताओं की भूमिका पर इतिहासकारों के बीच बहस होती रही है और आगे भी होती रहेगी।
लेकिन उस राजनीति के बीच एक सच निर्विवाद रूप से हमारे सामने खड़ा है—
सबसे बड़ी कीमत आम लोगों ने चुकाई।
किसी ने अपनी माँ खोई होगी।
किसी ने पिता।
किसी की बहन पीछे छूट गई होगी।
किसी का भाई फिर कभी वापस नहीं आया होगा।
और न जाने कितने दोस्त रहे होंगे जो कल तक एक ही गली में खेलते थे, एक ही स्कूल जाते थे, त्योहारों और खुशियों में एक-दूसरे के घर आते-जाते थे—लेकिन अचानक एक दिन उन्हें पता चला कि अब उनके बीच एक अंतरराष्ट्रीय सीमा खड़ी है।
सोचिए उस दोस्ती का आखिरी आलिंगन कैसा रहा होगा।
क्या उन्हें पता रहा होगा कि वे फिर कभी मिल पाएँगे या नहीं?
यही बँटवारे की सबसे बड़ी त्रासदी है।
उस दौर में कोई हिंदू उजड़ा, कोई मुसलमान, कोई सिख—लेकिन उजड़ने वाले हर घर के आँसू का रंग एक ही था।
दर्द का कोई धर्म नहीं था।
बिछड़ने की कोई जाति नहीं थी।
माँ के आँसू भारत में भी वैसे ही थे और पाकिस्तान में भी।
बच्चे की चीख सरहद देखकर अपना अर्थ नहीं बदलती।
यही कारण है कि बादशाह ख़ान की वह छोटी-सी पोटली मुझे झकझोरती है।
मेरे लिए वह सिर्फ दो जोड़ी कपड़ों की गठरी नहीं है।
वह जैसे बँटवारे के बाद बची हुई स्मृतियों की पोटली है।
उसमें शायद एक ऐसे हिंदुस्तान की याद भी महसूस होती है, जिसका सपना गांधी और बादशाह ख़ान जैसे लोगों ने देखा था—जहाँ धर्म से पहले इंसान की पहचान इंसान होने से होती।
बँटवारे के समय विस्थापित हुआ व्यक्ति सुबह तक अपने घर का मालिक था और शाम होते-होते शरणार्थी कहलाने लगा।
इससे बड़ी विडंबना क्या होगी?
जिस आँगन में उसकी कई पीढ़ियाँ पैदा हुई थीं, जिस मिट्टी में उसके पुरखे दफन या पंचतत्व में विलीन हुए थे, जिस गाँव की हर गली उसके बचपन को पहचानती थी—एक राजनीतिक निर्णय के बाद वही दुनिया उससे दूर हो गई।
देश बँटा था, दर्द नहीं
आज जब हम 1947 को पीछे मुड़कर देखते हैं तो हमें केवल यह नहीं पूछना चाहिए कि भारत और पाकिस्तान कैसे बने।
हमें यह भी पूछना चाहिए कि उसकी मानवीय कीमत क्या थी?
उन माताओं का क्या हुआ जिनके बच्चे बिछड़ गए?
उन बच्चों का क्या हुआ जिनका बचपन विस्थापन में खो गया?
उन बुजुर्गों पर क्या गुजरी जिन्होंने जीवन के अंतिम पड़ाव पर अपना पुश्तैनी घर छोड़ा?
और उन दोस्तों का क्या हुआ जिनकी दोस्ती से बड़ी अचानक एक सरहद हो गई?
देशों के नक्शे बदले जा सकते हैं।
सरकारें बदल सकती हैं।
सरहदें खींची जा सकती हैं।
लेकिन उजड़े हुए घर, खोए हुए अपने और अधूरी रह गई मुलाकातें किसी सरकारी आदेश से वापस नहीं लाई जा सकतीं।
इसीलिए मेरे लिए बँटवारा केवल अतीत नहीं है।
वह आने वाली पीढ़ियों के लिए एक चेतावनी है—जब सत्ता, नफरत और राजनीतिक महत्वाकांक्षाएँ इंसानियत से बड़ी हो जाती हैं, तो उनकी कीमत केवल उस दौर के लोग नहीं, कई पीढ़ियाँ चुकाती हैं।
और शायद इसीलिए बादशाह ख़ान का वह कथित वाक्य आज भी भीतर तक उतर जाता है—
“यही तो बचा है, इसे भी ले लोगी?”
नाम उनका बादशाह था।
मगर जिंदगी एक फकीर से भी ज्यादा सादा रही।
हाथ में छोटी-सी पोटली थी, मगर दिल में पूरे उपमहाद्वीप के लिए मोहब्बत और अहिंसा का सपना।
सलाम है बादशाह ख़ान को।
और श्रद्धांजलि उन तमाम बेनाम इंसानों को, जिनकी जिंदगी 1947 की उस लकीर ने हमेशा के लिए बदल दी।
**क्योंकि 1947 में जमीन का बँटवारा हुआ था…
दर्द का नहीं।**
वह दर्द सरहद के दोनों तरफ इंसानों के हिस्से आया—और इतिहास के पन्नों से निकलकर आज भी हमें यही चेतावनी देता है कि किसी भी सियासत से बड़ी इंसानियत होती है।
