जनता के लिए बना सामुदायिक शौचालय, ताले में कैद होकर हो गया जर्जर

श्यामपुर पंचायत में सरकारी योजना पर सवाल—निर्माण के बाद एक दिन भी आम लोगों के उपयोग में नहीं आने का आरोप

श्यामल प्रतीक | रक्सौल अनुमंडल रिपोर्टर
चाणक्य न्यूज़ इंडिया

आदापुर। आदापुर प्रखंड की श्यामपुर पंचायत में आम जनता की सुविधा के लिए बनाया गया सामुदायिक शौचालय आज खुद बदहाली की तस्वीर पेश कर रहा है। स्थानीय स्तर पर आरोप है कि निर्माण पूरा होने के बाद शौचालय को आम लोगों के लिए नियमित रूप से खोला ही नहीं गया। लंबे समय तक ताला लगे रहने और देखरेख के अभाव में सरकारी राशि से तैयार यह सार्वजनिक सुविधा अब जर्जर स्थिति में पहुंच गई है।

सबसे गंभीर सवाल यह है कि जब शौचालय सरकारी योजना के तहत जनता की सुविधा के लिए बनाया गया था, तो इसे बंद रखने का निर्णय किसके स्तर से और किस आधार पर लिया गया?

स्थानीय लोगों के अनुसार शौचालय बनने के बाद से ही इसमें ताला लगा रहा। जिस सार्वजनिक संपत्ति का उद्देश्य ग्रामीणों को स्वच्छता और शौचालय की सुविधा उपलब्ध कराना था, वह बंद रहने के कारण अपने उद्देश्य को पूरा नहीं कर सकी।

बनाया जरूर, लेकिन जनता तक पहुंची ही नहीं सुविधा

सरकारी योजनाओं का वास्तविक उद्देश्य केवल भवन का निर्माण कर देना नहीं, बल्कि उसका लाभ निर्धारित लोगों तक पहुंचाना भी है। श्यामपुर पंचायत का यह सामुदायिक शौचालय इसी व्यवस्था पर गंभीर प्रश्न खड़ा करता है।

यदि स्थानीय लोगों का यह आरोप सही है कि शौचालय निर्माण के बाद एक दिन भी सार्वजनिक उपयोग के लिए नहीं खोला गया, तो संबंधित विभाग को यह स्पष्ट करना चाहिए कि निर्माण के बाद इसका संचालन और रखरखाव किसके जिम्मे था तथा लंबे समय तक बंद रहने की निगरानी क्यों नहीं की गई?

सार्वजनिक संपत्ति पर ताला क्यों?

यह मामला केवल एक जर्जर शौचालय का नहीं है। सवाल सरकारी धन, सार्वजनिक संपत्ति और जवाबदेही का भी है।

क्या किसी व्यक्ति अथवा स्थानीय स्तर के जिम्मेदार को सार्वजनिक शौचालय पर ताला लगाकर उसे लंबे समय तक बंद रखने का अधिकार था? यदि ताला प्रशासनिक कारणों से लगाया गया था, तो उसे जनता के लिए खोलने की व्यवस्था क्यों नहीं हुई? और यदि बिना सक्षम आदेश के इसे बंद रखा गया, तो जिम्मेदारी किसकी तय होगी?

अब जांच और जवाबदेही जरूरी

प्रखंड प्रशासन एवं संबंधित विभाग को स्थल का निरीक्षण कर यह पता लगाना चाहिए कि शौचालय कब और किस योजना से बनाया गया, निर्माण पर कितनी राशि खर्च हुई, इसे किसे हस्तांतरित किया गया और इसके संचालन एवं रखरखाव की जिम्मेदारी किसकी थी।

जांच में यदि लापरवाही सामने आती है तो जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। साथ ही जर्जर हो चुके शौचालय की मरम्मत कर इसे शीघ्र आम जनता के उपयोग के लिए उपलब्ध कराने की आवश्यकता है।

सरकारी योजना का उद्देश्य कागज पर निर्माण पूरा करना नहीं, बल्कि जनता को सुविधा देना है। श्यामपुर का यह बंद और जर्जर सामुदायिक शौचालय अब यही सवाल पूछ रहा है—जनता के पैसे से बनी सुविधा आखिर जनता से ही दूर क्यों रही?

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