तीन दशक से तालाब के बीच अडिग है शहर की पहचान; जनसहयोग से आकार लेने वाली धरोहर भारत-नेपाल की साझा धार्मिक संस्कृति की भी साक्षी—अब जलकुंभी और रखरखाव की चुनौती पूछ रही है, क्या हम अपनी विरासत बचा पाएंगे?
विशेष रिपोर्ट | श्यामल प्रतीक
रक्सौल अनुमंडल संवाददाता | चाणक्य न्यूज़ इंडिया
रक्सौल, पूर्वी चंपारण।
शहर समय के साथ बदलते हैं। सड़कें चौड़ी होती हैं, बाजार फैलते हैं, नई इमारतें खड़ी होती हैं और पुरानी पीढ़ियों की जगह नई पीढ़ियां ले लेती हैं। लेकिन हर शहर में कुछ ऐसी जगहें होती हैं, जिन्हें केवल ईंट-पत्थर से नहीं बनाया जाता—वे लोगों की आस्था, स्मृतियों और सामूहिक पहचान से बनती हैं।
भारत-नेपाल सीमा के रक्सौल में थाना परिसर स्थित तालाब के बीच खड़ा सूर्य मंदिर ऐसी ही एक धरोहर है।
छठ के दिनों में जब घाटों पर दीप जगमगाते हैं, व्रती जल में खड़े होकर अस्ताचलगामी और उदयमान सूर्य को अर्घ्य देते हैं और मंदिर परिसर भक्ति से भर उठता है, तब यह स्थान केवल एक मंदिर नहीं रह जाता। यह रक्सौल की संस्कृति का जीवंत चेहरा बन जाता है।
लेकिन आज इसी तस्वीर का दूसरा पहलू चिंता पैदा करता है। मंदिर की भव्यता के आसपास तालाब में फैलती जलकुंभी और रखरखाव की आवश्यकता मानो शहर से पूछ रही है—
जिस धरोहर ने हमें पहचान दी, क्या हम उसकी पहचान बचा पाएंगे?
आज के सूर्य मंदिर से भी पुरानी है इस परिसर की धार्मिक स्मृति
इस परिसर की धार्मिक कहानी वर्तमान सूर्य मंदिर के निर्माण से पहले की बताई जाती है। वर्ष 2017 में प्रकाशित एक रिपोर्ट में मंदिर के संस्थापक पंडित भाग्यनारायण पाण्डेय के हवाले से यहां पहले से मौजूद पुराने महादेव मंदिर और तालाब से जुड़ी धार्मिक परंपराओं का उल्लेख किया गया था। उसी विवरण में तालाब को सात कुओं से जुड़ा जलाशय और सूर्य उपासना की स्थानीय परंपरा से संबंधित बताया गया है। इन दावों को स्थानीय धार्मिक परंपरा के रूप में देखा जाना अधिक उचित है, क्योंकि इनकी स्वतंत्र पुरातात्विक पुष्टि उपलब्ध नहीं है।
यानी आधुनिक सूर्य मंदिर भले तीन दशक पहले आकार में आया हो, लेकिन इस स्थान पर आस्था की कहानी उससे पहले शुरू हो चुकी थी।
1990 में रखी गई उस सपने की नींव
उपलब्ध प्रकाशित विवरणों के अनुसार 9 सितंबर 1990 को तत्कालीन विधायक स्व. राजनन्दन राय ने सूर्य मंदिर का शिलान्यास किया था। मंदिर निर्माण में तत्कालीन पुलिस इंस्पेक्टर सह थानाध्यक्ष आर.एस. राय की महत्वपूर्ण भूमिका बताई गई है और इंजीनियर रामदास को निर्माण से जुड़ी समिति का सचिव बताया गया है। मंदिर को जनसहयोग से विकसित किए जाने का भी उल्लेख मिलता है।
यही इस मंदिर के इतिहास का सबसे खूबसूरत अध्याय भी है।
यह किसी एक परिवार, व्यक्ति या संस्था की धरोहर बनकर नहीं उभरा। इसके पीछे जनसहयोग, प्रशासनिक पहल और स्थानीय समाज की आस्था एक साथ दिखाई देती है।
तालाब के बीच धीरे-धीरे आकार लेता मंदिर आने वाले वर्षों में रक्सौल के धार्मिक परिदृश्य का स्थायी हिस्सा बन गया।
तीन मंजिलों में आस्था का अनूठा संगम
सूर्य मंदिर की वास्तुकला भी इसे विशिष्ट बनाती है।
प्रकाशित विवरणों के अनुसार तालाब के बीच बने इस तीन-मंजिला मंदिर के प्रथम तल पर मां दुर्गा, दूसरे तल पर संकटमोचन हनुमान और तीसरी मंजिल पर भगवान सूर्य की प्रतिमा स्थापित है। तालाब के किनारों पर छठ व्रतियों के अर्घ्य के लिए चबूतरे बनाए गए हैं।
पानी के बीच ऊपर उठता मंदिर, उसे जोड़ती सीढ़ियां और चारों ओर घाट—इन सबने मिलकर इसे रक्सौल के सबसे अलग दिखने वाले धार्मिक स्थलों में स्थान दिया है।
पशुपतिनाथ की राह से जुड़ती रक्सौल की आस्था
सूर्य मंदिर की पहचान को रक्सौल की सीमा से आगे ले जाने वाली एक और दिलचस्प परंपरा है।
पुराने प्रकाशित विवरण बताते हैं कि नेपाल स्थित पशुपतिनाथ मंदिर की यात्रा पर जाने वाले श्रद्धालुओं के बीच रक्सौल के सूर्य मंदिर में पूजा कर आगे बढ़ने की परंपरा रही है। भारत और नेपाल दोनों ओर से छठ के अवसर पर श्रद्धालुओं के यहां पहुंचने की रिपोर्टें भी प्रकाशित हुई हैं।
अप्रैल 2024 में भी चैती छठ के दौरान भारत और नेपाल के छठ व्रतियों द्वारा यहां एक साथ अर्घ्य देने की खबर दर्ज की गई थी।
इसी कारण यह मंदिर केवल धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि भारत-नेपाल की साझा सांस्कृतिक और धार्मिक निकटता का प्रतीक बनने की क्षमता रखता है।
सीमा कागज पर दो देशों को अलग कर सकती है, लेकिन आस्था के ऐसे केंद्र बताते हैं कि संस्कृति और परंपराओं के रिश्ते सीमाओं से कहीं बड़े होते हैं।
भव्य मंदिर के सामने तालाब की बदहाली क्यों?
आज सूर्य मंदिर को देखने वाला व्यक्ति उसकी वास्तुकला से आकर्षित होता है, लेकिन तालाब की ओर नजर जाते ही एक दूसरा दृश्य सामने आता है।
जलकुंभी और जलीय खरपतवार से घिरते हिस्से, जलाशय की नियमित सफाई की जरूरत और परिसर के सतत रखरखाव का प्रश्न इस खूबसूरत धार्मिक स्थल की छवि को प्रभावित करता है।
यह केवल सौंदर्य का मामला नहीं है।
तालाब इस पूरे धार्मिक परिसर का अभिन्न हिस्सा है। यहीं छठ व्रती सूर्य को अर्घ्य देते हैं। ऐसे में इसकी स्वच्छता, जल प्रबंधन और घाटों की सुरक्षा को केवल पर्व से कुछ दिन पहले होने वाली व्यवस्था तक सीमित नहीं रखा जा सकता।
सूर्य मंदिर और घाट की सजावट एवं सौंदर्यीकरण के प्रयास समय-समय पर किए गए हैं; नवंबर 2024 में भी छठ से पहले समिति और स्थानीय संस्थाओं की ओर से घाट को सजाने-संवारने की गतिविधियों की रिपोर्ट प्रकाशित हुई थी।
अब जरूरत है कि अस्थायी अभियान को स्थायी संरक्षण व्यवस्था में बदला जाए।
“यह सिर्फ मंदिर नहीं, रक्सौल की पहचान है” — रणजीत सिंह
स्वच्छ रक्सौल के अध्यक्ष रणजीत सिंह का मानना है कि सूर्य मंदिर को केवल छठ अथवा किसी विशेष पर्व के समय याद करने की परंपरा से आगे बढ़ना होगा।
उन्होंने कहा—
“सूर्य मंदिर हमारी धरोहर और रक्सौल की पहचान है। इसे केवल पर्व के समय नहीं, पूरे वर्ष स्वच्छ और सुंदर रखना हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है। तालाब की नियमित सफाई, जलकुंभी से मुक्ति, स्वच्छ एवं सुरक्षित घाट, प्रकाश व्यवस्था और परिसर के सौंदर्यीकरण पर स्थायी रूप से काम होना चाहिए। प्रशासन, मंदिर समिति, सामाजिक संस्थाएं और रक्सौल के नागरिक मिलकर प्रयास करें तो इसे भारत-नेपाल सीमा क्षेत्र के प्रमुख धार्मिक और पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया जा सकता है। हमारी कोशिश होनी चाहिए कि जो विरासत हमें मिली है, उसे आने वाली पीढ़ियों को और बेहतर रूप में सौंपें।”
रणजीत सिंह का यह संदेश उस व्यापक जिम्मेदारी की ओर संकेत करता है, जिसमें केवल प्रशासन नहीं बल्कि पूरे शहर की सहभागिता जरूरी है।
धार्मिक पर्यटन का नया केंद्र बन सकता है सूर्य मंदिर
रक्सौल की सबसे बड़ी ताकत उसकी भौगोलिक स्थिति है।
यह भारत से नेपाल जाने वाले प्रमुख प्रवेश मार्गों में शामिल है। बड़ी संख्या में भारतीय और नेपाली नागरिकों के साथ नेपाल जाने वाले यात्री भी इस शहर से गुजरते हैं।
ऐसे में यदि सूर्य मंदिर परिसर को योजनाबद्ध ढंग से विकसित किया जाए तो यह केवल छठ घाट नहीं रहेगा।
स्वच्छ तालाब, व्यवस्थित घाट, हरित परिसर, सुंदर प्रकाश व्यवस्था, श्रद्धालुओं के लिए बुनियादी सुविधाएं और मंदिर के इतिहास को बताता एक हेरिटेज सूचना-पट्ट इसे रक्सौल के धार्मिक-सांस्कृतिक पर्यटन का महत्वपूर्ण पड़ाव बना सकता है।
उस सूचना-पट्ट पर उन लोगों और उस जनसहयोग की कहानी भी दर्ज होनी चाहिए, जिसने तीन दशक पहले इस मंदिर के निर्माण का सपना देखा था।
क्योंकि इमारतों की मरम्मत की जा सकती है, लेकिन खोया हुआ इतिहास दोबारा नहीं बनाया जा सकता।
पर्व की सफाई से आगे बढ़कर चाहिए ‘सूर्य मंदिर संरक्षण योजना’
रक्सौल में विकास की नई संभावनाएं लगातार आकार ले रही हैं। लेकिन आधुनिक शहर बनने की दौड़ में यदि उसकी सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान पीछे छूट जाए तो विकास अधूरा रह जाता है।
सूर्य मंदिर और उसके तालाब के लिए अब ऐसी व्यवस्था की आवश्यकता है जिसमें सालभर सफाई, जलकुंभी नियंत्रण, जलाशय का रखरखाव, सुरक्षित घाट, प्रकाश, हरियाली और निगरानी सुनिश्चित हो।
यह काम प्रशासन अकेले नहीं कर सकता।
नगर परिषद, मंदिर समिति, स्थानीय सामाजिक संगठन, व्यवसायी, जनप्रतिनिधि और नागरिक यदि एक साझा मंच पर आएं तो रक्सौल इस धरोहर को एक आदर्श धार्मिक परिसर में बदल सकता है।
आने वाली पीढ़ियों के नाम एक विरासत
तीन दशक से अधिक समय से तालाब के बीच खड़ा यह मंदिर रक्सौल को बदलते देख रहा है।
इसने असंख्य छठ व्रतियों के हाथों में जलते दीप देखे हैं।
भगवान भास्कर की ओर उठती प्रार्थनाएं देखी हैं।
भारत और नेपाल के श्रद्धालुओं को एक ही घाट पर खड़ा देखा है।
और शहर की कई पीढ़ियों को अपने सामने से गुजरते देखा है।
रक्सौल को इसका जवाब केवल शब्दों से नहीं, बल्कि संरक्षण के संकल्प से देना होगा।
क्योंकि बात सिर्फ एक मंदिर और तालाब की नहीं है—बात रक्सौल की आस्था, इतिहास और पहचान की है|
