‘एक पेड़ माँ के नाम’ के तहत कोटवा में 100 पौधों का रोपण; नेत्रिका फाउंडेशन की मुहिम बच्चों को बना रही प्रकृति का प्रहरी
विशेष कवर स्टोरी | श्यामल प्रतीक
कोटवा/पूर्वी चम्पारण।
पर्यावरण संरक्षण की जिम्मेदारी केवल सरकारों, पर्यावरण विशेषज्ञों या संस्थाओं की नहीं है। इसका सबसे मजबूत रास्ता उस नई पीढ़ी से होकर गुजरता है, जिसके हाथों में आने वाले कल की दुनिया होगी।
यदि आज एक बच्चा अपने हाथों से पौधा लगाता है, उसकी देखभाल करता है और उसे वृक्ष बनते हुए देखता है, तो उसके भीतर प्रकृति के प्रति विकसित होने वाला रिश्ता भविष्य में पर्यावरण संरक्षण की मजबूत नींव बन सकता है।
इसी सोच को जमीन पर उतारने के उद्देश्य से नेत्रिका फाउंडेशन द्वारा संचालित “पर्यावरण की पाठशाला” लगातार विद्यालयों और बच्चों को प्रकृति से जोड़ने की दिशा में आगे बढ़ रही है।
इसी अभियान की महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में वन प्रमंडल, मोतिहारी के सहयोग से शिवधर अनूठा उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, कोटवा में “एक पेड़ माँ के नाम—पर्यावरण की पाठशाला सह पौधारोपण कार्यक्रम” आयोजित किया गया।
विद्यालय परिसर में बच्चों ने शिक्षकों और अतिथियों की मौजूदगी में 100 पौधे लगाकर हरियाली और पर्यावरण संरक्षण का संदेश दिया।
🌱 एक पौधा नहीं, एक जिम्मेदारी बच्चों के हाथ
इस कार्यक्रम की सबसे महत्वपूर्ण तस्वीर केवल 100 पौधों का लगाया जाना नहीं, बल्कि उन बच्चों की भागीदारी है जिनके हाथों से ये पौधे मिट्टी में लगाए गए।
“पर्यावरण की पाठशाला” का उद्देश्य पर्यावरण को किताब के किसी अध्याय तक सीमित रखने के बजाय उसे बच्चों के जीवन और व्यवहार का हिस्सा बनाना है।
आज जिस बच्चे ने अपने हाथों एक पौधा लगाया है, वही बच्चा आने वाले वर्षों में पेड़, जल, मिट्टी और प्रकृति के महत्व को कहीं अधिक संवेदनशीलता से समझ सकता है।
यही बच्चे आगे चलकर अपने परिवार और समाज में पर्यावरण संरक्षण के संदेशवाहक भी बन सकते हैं।
डॉ. कमलेश कुमार—एक कार्यक्रम से आगे की पर्यावरणीय सोच
इस अभियान को संस्थागत स्वरूप देने और निरंतर आगे बढ़ाने में नेत्रिका फाउंडेशन के अध्यक्ष डॉ. कमलेश कुमार की महत्वपूर्ण भूमिका है।
डॉ. कमलेश कुमार पर्यावरण संरक्षण को केवल पौधारोपण के एक कार्यक्रम तक सीमित न रखकर इसे बच्चों और समाज के बीच लगातार चलने वाली जागरूकता प्रक्रिया के रूप में विकसित करने को लेकर गंभीर हैं।
उनके कार्यों को करीब से देखने पर यह महसूस होता है कि पर्यावरण के प्रति उनकी चिंता औपचारिक आयोजनों तक सीमित नहीं है। उनका प्रयास है कि नेत्रिका फाउंडेशन के माध्यम से ऐसे कार्यक्रम लगातार संचालित हों, जिनका पर्यावरण और समाज पर दीर्घकालीन सकारात्मक प्रभाव पड़े।
उनकी सोच में विद्यालयों और बच्चों की भूमिका विशेष है। यदि पर्यावरण के प्रति जागरूकता बचपन से विकसित हो, तो वही बच्चा आगे चलकर प्रकृति के प्रति जिम्मेदार नागरिक बन सकता है।
आने वाले समय में भी नेत्रिका फाउंडेशन के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण से जुड़े विभिन्न कार्यक्रमों को आगे बढ़ाने की योजना है, ताकि पौधारोपण के साथ-साथ पौधों के संरक्षण और पर्यावरणीय जिम्मेदारी की भावना को व्यापक बनाया जा सके।
🌿 विनय कुमार—स्कूल-स्कूल पहुंच रही ‘पर्यावरण की पाठशाला’ की जमीनी ताकत
इस अभियान को विद्यालयों और बच्चों तक पहुंचाने में विनय कुमार मुख्य भूमिका निभा रहे हैं।
विनय कुमार लगातार विद्यालयों में पहुंचकर बच्चों को पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक करने, पौधारोपण के लिए प्रेरित करने और प्रकृति के प्रति उनकी जिम्मेदारी समझाने का कार्य कर रहे हैं।
उनकी कार्यशैली की विशेषता यह है कि पौधारोपण को केवल पौधा लगाने तक सीमित नहीं रखा जाता। बच्चों को यह भी समझाने का प्रयास किया जाता है कि पौधा लगाने के बाद उसे सुरक्षित रखना और वृक्ष बनने तक उसकी देखभाल करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
विद्यालयों में बच्चों के माध्यम से लगातार पौधे लगवाने की यह पहल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां एक साथ दो काम हो रहे हैं—धरती पर पौधा लगाया जा रहा है और बच्चे के मन में पर्यावरण चेतना का बीज बोया जा रहा है।
नेतृत्व से जमीन तक—एक साझा प्रयास
“पर्यावरण की पाठशाला” की ताकत इसके सामूहिक स्वरूप में दिखाई देती है।
डॉ. कमलेश कुमार के नेतृत्व में नेत्रिका फाउंडेशन इस अभियान को संस्थागत दिशा दे रहा है, जबकि विनय कुमार उस सोच को विद्यालयों और बच्चों के बीच जमीन पर उतारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।
इसके साथ वन विभाग, विद्यालय प्रशासन, शिक्षक और विद्यार्थी जुड़ते हैं तो पौधारोपण किसी एक संस्था का कार्यक्रम न रहकर सामूहिक पर्यावरणीय जिम्मेदारी का रूप लेने लगता है।
🌱 ‘एक पेड़ माँ के नाम’—भावना से जुड़ी पर्यावरण की जिम्मेदारी
“एक पेड़ माँ के नाम” पर्यावरण संरक्षण को एक बेहद संवेदनशील भावना से जोड़ता है।
मां जीवन देती है और प्रकृति उस जीवन को बनाए रखने के लिए हवा, पानी, भोजन और प्राकृतिक संसाधन उपलब्ध कराती है।
इसलिए मां के नाम लगाया गया पौधा केवल एक स्मृति या तस्वीर बनकर न रह जाए।
उसे सुरक्षित रखकर वृक्ष बनाना ही उस भावना के प्रति वास्तविक जिम्मेदारी होगी।
विधायक मनोज कुमार यादव ने दिया हरियाली का संदेश
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि विधायक श्री मनोज कुमार यादव, विशिष्ट अतिथि जिला स्कूल की पूर्व प्राचार्य श्रीमती शशिकला तथा नेत्रिका फाउंडेशन के अध्यक्ष डॉ. कमलेश कुमार ने कार्यक्रम को संबोधित किया और एक-एक पौधा लगाकर पर्यावरण संरक्षण का संदेश दिया।
विद्यालय परिसर में शिक्षक ऋषिकेश कुमार के नेतृत्व में बच्चों ने 100 पौधे लगाए।
कार्यक्रम को सफल बनाने में विद्यालय के प्राचार्य श्री हीरा मिश्रा, शिक्षक ऋषिकेश कुमार, सुदिष्ट प्रसाद यादव, आरती रानी सहित अन्य शिक्षक-शिक्षिकाओं और विद्यार्थियों की महत्वपूर्ण भूमिका रही।
🌎 100 पौधों से बड़ी उपलब्धि—बच्चों में पैदा हो रही पर्यावरण चेतना
किसी भी पौधारोपण अभियान का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि कितने पौधे लगाए गए।
असली कसौटी यह है कि कितने पौधे वृक्ष बने और कितने बच्चों ने पर्यावरण संरक्षण को अपनी जिम्मेदारी के रूप में स्वीकार किया।
इसी दृष्टि से “पर्यावरण की पाठशाला” का विद्यालय आधारित मॉडल महत्वपूर्ण है।
यदि एक बच्चा एक पौधे की जिम्मेदारी लेता है, उसे पानी देता है, उसकी सुरक्षा करता है और वर्षों तक उसे बढ़ते हुए देखता है, तो पर्यावरण संरक्षण उसके लिए किताब की परिभाषा नहीं बल्कि जीवन का अनुभव बन जाता है।
आज पौधे, कल वृक्ष—और उसके बाद एक सुरक्षित पीढ़ी
जलवायु परिवर्तन, बढ़ते तापमान, वायु एवं जल प्रदूषण, वनों की कटाई, जैव विविधता के नुकसान और प्राकृतिक संसाधनों पर बढ़ते दबाव के दौर में नई पीढ़ी को पर्यावरण के प्रति संवेदनशील बनाना समय की आवश्यकता है।
कोटवा में बच्चों द्वारा लगाए गए ये 100 पौधे इसलिए केवल किसी कार्यक्रम का आंकड़ा नहीं हैं।
ये 100 उम्मीदें हैं।
इनमें से प्रत्येक पौधे के साथ एक बच्चे की जिम्मेदारी, एक परिवार की जागरूकता और आने वाली पीढ़ियों की हरियाली जुड़ सकती है।
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✍️ कलम से पर्यावरण की पहरेदारी — श्यामल प्रतीक
“मेरे लिए केवल रिपोर्टर होना बड़ी बात नहीं है; महत्वपूर्ण यह है कि हम अपने कर्तव्य का निर्वहन कितनी ईमानदारी और जिम्मेदारी से करते हैं। एक पत्रकार समाचारों का वाहक होने के साथ-साथ समाज का प्रहरी भी है। इसलिए समाज और आने वाली पीढ़ियों को प्रभावित करने वाले पर्यावरण जैसे मुद्दों पर हमारी नजर और हमारी कलम दोनों का सक्रिय रहना जरूरी है।
पर्यावरण से जुड़े विषयों पर लिखना और लोगों को जागरूक करना मेरे लिए केवल पत्रकारिता का विषय नहीं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी है। दुनिया आज जलवायु परिवर्तन, बढ़ते तापमान, वायु और जल प्रदूषण, वनों की कटाई, जैव विविधता के नुकसान तथा विभिन्न क्षेत्रों में जारी संघर्षों और मानवीय गतिविधियों से पैदा होने वाले पर्यावरणीय दबाव जैसी गंभीर चुनौतियों का सामना कर रही है। इसका प्रभाव केवल हमारी पीढ़ी तक सीमित नहीं रहेगा; आने वाली पीढ़ियां भी हमारे आज के फैसलों का परिणाम देखेंगी।
मैं मानता हूं कि पत्रकारिता का दायित्व केवल समस्या दिखाना नहीं है। जहां कोई व्यक्ति, संस्था, शिक्षक या बच्चा समाज और पर्यावरण को बचाने के लिए सकारात्मक काम कर रहा है, उसे सामने लाना भी पत्रकारिता की जिम्मेदारी है। क्योंकि सकारात्मक प्रयासों को पहचान मिलने से दूसरे लोग भी प्रेरित होते हैं।
जब मैं किसी बच्चे को अपने छोटे हाथों से पौधा लगाते देखता हूं, तो मुझे वहां केवल एक पौधा दिखाई नहीं देता—मुझे उसमें आने वाले भविष्य की उम्मीद दिखाई देती है। आज यदि हम बच्चों के भीतर प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी पैदा कर सके, तो शायद कल हमें पर्यावरण बचाने के लिए केवल अभियान चलाने की जरूरत नहीं पड़ेगी; पर्यावरण संरक्षण उनकी जीवनशैली का हिस्सा होगा।
मेरी कोशिश रहेगी कि अपनी कलम के माध्यम से पर्यावरण, जल, जंगल, जैव विविधता और प्रकृति से जुड़े मुद्दों को लगातार सामने लाता रहूं और साथ ही उन लोगों और प्रयासों को भी समाज के सामने लाऊं जो धरती को बचाने के लिए ईमानदारी से काम कर रहे हैं।
क्योंकि हम केवल आज के लिए नहीं जी रहे—हम आने वाली पीढ़ियों के लिए यह धरती संभाल रहे हैं। पर्यावरण की रक्षा किसी एक व्यक्ति या संस्था का अभियान नहीं, हम सभी का साझा कर्तव्य है।”
— श्यामल प्रतीक
स्वतंत्र पत्रकार | विशेष कवर स्टोरी
