कारगिल: सिर्फ 22 साल की उम्र में इतिहास लिख गए कैप्टन विजयंत थापर

नॉल की चोटी पर अंतिम सांस तक लड़े ‘रॉबिन’, आखिरी खत में भी परिवार से पहले देश और इंसानियत की चिंता

कारगिल: श्यामल प्रतीक की नज़र से
विशेष कवर स्टोरी | श्यामल प्रतीक

कारगिल की बर्फीली चोटियों पर 1999 में लड़ा गया युद्ध केवल जमीन वापस लेने की लड़ाई नहीं था। यह उन नौजवान सैनिकों की परीक्षा थी, जिनके सामने पूरा जीवन पड़ा था, लेकिन जिन्होंने अपने सपनों से पहले राष्ट्र को चुना।

ऐसे ही एक योद्धा थे 2 राजपूताना राइफल्स के कैप्टन विजयंत थापर, वीर चक्र—परिवार और दोस्तों के बीच जिन्हें प्यार से ‘रॉबिन’ कहा जाता था।

उम्र महज 22 वर्ष।

जिस उम्र में अधिकांश युवा अपने भविष्य की शुरुआत कर रहे होते हैं, उस उम्र में विजयंत थापर ने कारगिल की चट्टानों पर अपना नाम भारतीय सैन्य इतिहास में हमेशा के लिए दर्ज करा दिया।

सैनिक परिवार में जन्मा एक सैनिक

26 दिसंबर 1976 को जन्मे विजयंत थापर ऐसे परिवार से आते थे, जहां सैन्य सेवा जीवन का हिस्सा थी। उनके पिता कर्नल वी. एन. थापर भारतीय सेना में अधिकारी रहे।

वर्दी, अनुशासन और राष्ट्रसेवा के संस्कार के बीच बड़े हुए विजयंत ने भी सेना को अपना जीवन चुना। भारतीय सैन्य अकादमी से प्रशिक्षण के बाद उन्हें 2 राजपूताना राइफल्स में कमीशन मिला।

लेकिन उन्हें शायद अंदाजा भी नहीं रहा होगा कि सेना में आने के कुछ ही समय बाद इतिहास उन्हें इतनी बड़ी परीक्षा के सामने खड़ा कर देगा।

वर्ष 1999 में कारगिल युद्ध शुरू हुआ और विजयंत की बटालियन को द्रास क्षेत्र के सबसे कठिन मोर्चों में उतरना पड़ा।

तोलोलिंग ने दिखा दिया था राजपूताना का इरादा

कारगिल युद्ध में तोलोलिंग की लड़ाई भारतीय सेना के लिए निर्णायक उपलब्धियों में से एक बनी। 2 राजपूताना राइफल्स ने यहां कठिन परिस्थितियों में लड़ते हुए महत्वपूर्ण सफलता हासिल की।

लेकिन युद्ध अभी समाप्त नहीं हुआ था।

द्रास सेक्टर की कई ऊंचाइयों पर दुश्मन की मजबूत पकड़ बनी हुई थी। इन्हीं में एक महत्वपूर्ण लक्ष्य था नॉल (Knoll)।

ऊंचाई पर बैठे दुश्मन को सामरिक लाभ हासिल था। भारतीय जवानों को लगभग खुले और पथरीले क्षेत्र से ऊपर बढ़ना था। हर कदम जोखिम से भरा था।

यहीं कैप्टन विजयंत थापर के साहस की अंतिम परीक्षा होने वाली थी।

नॉल की ओर बढ़ता 22 वर्षीय कमांडर

28 और 29 जून 1999 की रात।

दुर्गम पहाड़। कठिन चढ़ाई। सामने मजबूत दुश्मन।

लेकिन 2 राजपूताना राइफल्स के जवान आगे बढ़ते रहे।

कैप्टन विजयंत थापर अपने जवानों के साथ अग्रिम मोर्चे पर थे। भीषण मुकाबले के बीच भारतीय सैनिकों ने नॉल की ओर अपना अभियान जारी रखा।

इसी लड़ाई में 29 जून 1999 को कैप्टन विजयंत थापर वीरगति को प्राप्त हुए।

वह केवल 22 वर्ष के थे।

लेकिन जिस लक्ष्य के लिए वह और उनके साथी लड़े, उस पर भारतीय सैनिकों ने अपना नियंत्रण स्थापित किया।

उनकी असाधारण वीरता के लिए भारत सरकार ने उन्हें मरणोपरांत वीर चक्र से सम्मानित किया।

युद्ध के बीच भी जिंदा थी इंसानियत

विजयंत थापर को केवल युद्धभूमि का साहस ही असाधारण नहीं बनाता। उनकी कहानी का एक अत्यंत मानवीय पक्ष भी है।

कश्मीर में तैनाती के दौरान उनकी मुलाकात एक छोटी बच्ची रुखसाना से हुई थी, जिसका परिवार आतंकवाद से प्रभावित हुआ था। विजयंत ने उस बच्ची के प्रति अपनापन और जिम्मेदारी दिखाई।

युद्ध पर जाने के बाद भी वह उसे नहीं भूले।

अपनी अंतिम चिट्ठी में उन्होंने अपने परिवार से रुखसाना की मदद जारी रखने की इच्छा व्यक्त की।

यही वह बिंदु है जहां विजयंत थापर की कहानी युद्ध की सीमाओं से आगे निकल जाती है।

हाथ में हथियार था, सामने दुश्मन था, लेकिन दिल में एक असहाय बच्ची के लिए जगह अब भी बची हुई थी।

यही भारतीय सैनिक का वह मानवीय चेहरा है जिसे युद्ध के आंकड़ों में नहीं पढ़ा जा सकता।

वह आखिरी खत…

नॉल के अभियान से पहले विजयंत थापर ने अपने परिवार के लिए एक पत्र लिखा था—ऐसा पत्र जिसे उनके बलिदान के बाद पढ़ा जाना था।

उस पत्र में परिवार के प्रति प्रेम था, अपने साथियों के प्रति सम्मान था और देश के प्रति कर्तव्य की अद्भुत स्पष्टता थी।

उन्होंने अपने माता-पिता को टूटने के बजाय गर्व करने का संदेश दिया और देश के लिए जीवन समर्पित करने की अपनी भावना व्यक्त की।

आज वह पत्र भारतीय सैन्य इतिहास की सबसे मार्मिक विरासतों में गिना जाता है।

क्योंकि उसे पढ़ते हुए यह समझ आता है कि नॉल की ओर बढ़ रहा वह 22 वर्षीय अधिकारी जानता था कि रास्ता कितना खतरनाक है—फिर भी उसके कदम पीछे नहीं हटे।

एक पिता की तीर्थयात्रा

कैप्टन विजयंत थापर की कहानी उनके बलिदान पर समाप्त नहीं होती।

उनके पिता कर्नल वी. एन. थापर वर्षों से उस स्थान पर जाते रहे हैं जहां उनके बेटे ने मातृभूमि के लिए अंतिम लड़ाई लड़ी थी।

एक पिता के लिए वह पहाड़ केवल युद्धभूमि नहीं हो सकता।

वह उस बेटे की स्मृति है जिसे उन्होंने सेना की वर्दी में देश को सौंपा था और जिसने उसी वर्दी में अपना सर्वोच्च कर्तव्य निभाया।

कारगिल की उस चोटी पर आज विजयंत नहीं हैं, लेकिन उनकी कहानी हर उस भारतीय को यह याद दिलाती है कि देश की सीमाओं की कीमत केवल नक्शे पर खींची गई रेखाओं से नहीं मापी जाती—उनके पीछे असंख्य सैनिकों और परिवारों का त्याग खड़ा होता है।

22 वर्ष की जिंदगी, पीढ़ियों के लिए विरासत

कैप्टन विजयंत थापर ने लंबा जीवन नहीं जिया।

लेकिन इतिहास जीवन की लंबाई नहीं, उसके अर्थ को याद रखता है।

22 वर्ष की उम्र में उन्होंने वह कर दिखाया जिसके कारण आज भी उनका नाम सम्मान से लिया जाता है।

नॉल की चट्टानों पर बहादुरी, एक छोटी बच्ची के लिए संवेदना, परिवार के लिए अंतिम संदेश और राष्ट्र के प्रति अडिग कर्तव्य—ये सभी मिलकर विजयंत थापर को केवल एक युद्ध नायक नहीं, बल्कि भारतीय सैनिक के चरित्र का प्रतीक बनाते हैं।

श्यामल प्रतीक की कलम से

कारगिल के वीरों पर लिखते हुए बार-बार एक सवाल मन में आता है—आखिर वह कौन-सी शक्ति थी जिसने इतनी कम उम्र के जवानों को उन पहाड़ों पर आगे बढ़ते रहने का साहस दिया, जहां हर कदम के सामने मौत खड़ी थी?

कैप्टन विजयंत थापर की कहानी शायद इसका उत्तर देती है।

वह शक्ति थी—कर्तव्य।
वह शक्ति थी—अपने साथियों पर विश्वास।
और सबसे बढ़कर वह शक्ति थी—भारत के तिरंगे के प्रति अटूट निष्ठा।

सिर्फ 22 साल का एक नौजवान अपनी जिंदगी की शुरुआत ही कर रहा था। उसके भी सपने रहे होंगे, परिवार के साथ भविष्य की कल्पनाएं रही होंगी। लेकिन जब चुनाव अपने भविष्य और मातृभूमि के कर्तव्य के बीच आया, उसने राष्ट्र को चुना।

कारगिल की लड़ाई समाप्त हुए वर्षों बीत चुके हैं। नॉल की चोटियां फिर शांत हैं। वहां आज युद्ध का शोर नहीं है।

लेकिन इतिहास की अपनी आवाज होती है।

जब भी कारगिल की उन चोटियों पर तिरंगा हवा से बात करता होगा, शायद वह आने वाली पीढ़ियों को यही कहानी सुनाता होगा—

यहां कभी 22 साल का एक भारतीय सैनिक आया था।

उसका नाम था—

कैप्टन विजयंत थापर।

वह घर वापस नहीं लौटा…

लेकिन भारत की स्मृति में हमेशा के लिए अमर हो गया। 🇮🇳

शत्-शत् नमन।

— श्यामल प्रतीक
कारगिल: श्यामल प्रतीक की नज़र से

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