लुप्त होती धरोहरें
अतिक्रमण और गंदगी की शिकायतों के बीच योजनाओं की प्रगति पर सवाल; जमीन का सीमांकन, खर्च का ब्योरा और नियमित देखभाल की जिम्मेदारी स्पष्ट करने की जरूरत
विशेष रिपोर्ट
श्यामल प्रतीक | रक्सौल अनुमंडल रिपोर्टर
चाणक्य न्यूज़ इंडिया
आदापुर, पूर्वी चंपारण। जिस पोखरे से आदापुर की आस्था, सामाजिक जीवन और पीढ़ियों की स्मृतियां जुड़ी हैं, उसके संरक्षण की स्थिति आज स्पष्ट जवाब मांग रही है। थाना के समीप स्थित इस ऐतिहासिक जलाशय के आसपास गंदगी और किनारों पर अतिक्रमण की शिकायतें हैं। वर्षों से सौंदर्यीकरण और जीर्णोद्धार की योजनाओं का उल्लेख सामने आता रहा है। ऐसे में सवाल उठता है कि इन योजनाओं से पोखरे की स्थिति में कितना बदलाव आया, उसकी जमीन की सुरक्षा के लिए क्या हुआ और नियमित देखभाल की जवाबदेही किसके पास है?
इस पोखरे का मामला आदापुर की साझा विरासत और सार्वजनिक संसाधनों की देखभाल से जुड़ा है। किसी पुरानी धरोहर के संरक्षण का अर्थ उसके स्वरूप, उपयोग और उससे जुड़े सामाजिक संबंधों को बचाए रखना भी है। पोखरे के संदर्भ में इसी व्यापक दृष्टि की जरूरत है, ताकि सफाई, जमीन की सुरक्षा और जलाशय के भविष्य को एक साथ देखा जा सके।
पुराने प्रकाशित विवरण इस स्थान के सांस्कृतिक महत्व की झलक देते हैं। इनमें छठ पूजा, किनारों पर मंदिरों और पूर्वी छोर पर कब्रिस्तान का उल्लेख मिलता है। अलग-अलग आस्थाओं से जुड़े इन स्थलों के बीच स्थित पोखरे को स्थानीय सौहार्द का प्रतीक बताया गया है। इसका संरक्षण उस साझा सामाजिक स्मृति को सहेजने का अवसर भी है, जिसमें कस्बे के अलग-अलग समुदायों की मौजूदगी दर्ज है।
इसके निर्माण-वर्ष और निर्माता के संबंध में भरोसेमंद अभिलेखीय पुष्टि उपलब्ध नहीं है। इसलिए इसके इतिहास को प्रमाणित करने के लिए पुराने राजस्व अभिलेखों, नक्शों और अन्य दस्तावेजों की पड़ताल जरूरी है। बुजुर्गों के संस्मरण इस प्रयास को समृद्ध कर सकते हैं, बशर्ते लोकस्मृतियों और प्रमाणित ऐतिहासिक तथ्यों को स्पष्ट रूप से अलग रखा जाए।
वर्तमान चिंता पोखरे के आसपास कचरा जमा होने और किनारों पर कब्जे की शिकायतों को लेकर है। स्थानीय स्तर से उपलब्ध विवरण में सफाई और देखभाल के प्रभावी परिणाम नहीं दिखने की बात कही गई है। इन शिकायतों की पुष्टि और समस्या के वास्तविक विस्तार को समझने के लिए स्थल निरीक्षण तथा अभिलेखों के आधार पर सीमांकन आवश्यक है। पोखरे की दर्ज जमीन कितनी है, उसकी सीमा कहां तक है और किसी हिस्से पर अतिक्रमण है या नहीं—इन प्रश्नों का स्पष्ट उत्तर आधिकारिक जांच से ही मिल सकता है।
पुराने प्रकाशित विवरणों को क्रम से देखने पर संरक्षण से जुड़े कई अधूरे सवाल उभरते हैं। सितंबर 2019 के एक विवरण में तत्कालीन विधायक डॉ. अजय कुमार सिंह के हवाले से पोखरे के विकास के लिए 95 लाख रुपये की योजना की स्वीकृति की बात कही गई थी। उपलब्ध सामग्री से वास्तविक राशि निर्गत होने, खर्च होने और पूरे हुए कार्यों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं होती। स्वीकृति का प्रकाशित उल्लेख अपने आप में भुगतान या निर्माण पूरा होने का प्रमाण नहीं है।
नवंबर 2021 के प्रकाशित विवरण में नाले का गंदा पानी पोखरे में पहुंचने की समस्या उठाई गई थी। यह संदर्भ बताता है कि प्रदूषण की चिंता पहले भी सामने आ चुकी है। अब यह स्पष्ट होना चाहिए कि उस समस्या के समाधान के लिए क्या व्यवस्था की गई और उसकी वर्तमान स्थिति क्या है। यदि दूषित पानी का प्रवेश जारी है, तो सफाई के साथ उसके स्रोत का समाधान भी संरक्षण योजना का आवश्यक हिस्सा होना चाहिए।
मार्च 2025 में जीर्णोद्धार का विषय विधान परिषद में उठाए जाने की जानकारी प्रकाशित हुई। उस विवरण के अनुसार, एमएलसी महेश्वर सिंह ने मामला उठाया था। लघु सिंचाई प्रमंडल, मोतिहारी के पत्रांक 342, दिनांक 5 मार्च 2025 के हवाले से बताया गया कि कनीय अभियंता के सर्वे में स्थायी और अस्थायी अतिक्रमण का उल्लेख था। अतिक्रमण हटाकर विस्तृत परियोजना प्रतिवेदन यानी डीपीआर तैयार करने की बात भी सामने आई थी। संबंधित पत्र और सर्वे की मूल प्रतियां इस रिपोर्ट के लिए उपलब्ध नहीं हैं; इसलिए इनके विवरण को प्रकाशित जानकारी के संदर्भ में ही रखा जा रहा है।
इन उल्लेखों के बाद प्रशासनिक प्रगति का स्पष्ट विवरण सामने आना जरूरी है। यदि सर्वे हुआ था, तो उसके निष्कर्षों पर क्या कार्रवाई हुई? सीमांकन और अतिक्रमण संबंधी प्रक्रिया कहां तक पहुंची? डीपीआर तैयार हुई या नहीं, और यदि हुई तो उसकी स्वीकृति तथा क्रियान्वयन की स्थिति क्या है? पुराने प्रस्ताव और बाद की जीर्णोद्धार प्रक्रिया का आपसी संबंध भी स्पष्ट होना चाहिए, ताकि अलग-अलग समय की योजनाओं को लेकर भ्रम न रहे।
95 लाख रुपये की योजना के संदर्भ में स्वीकृति आदेश, कार्य का दायरा, कार्यान्वयन एजेंसी, निर्गत राशि, वास्तविक व्यय और कार्य-प्रगति का ब्योरा स्थिति स्पष्ट कर सकता है। जो कार्य हुए हों, उनकी जानकारी सार्वजनिक होनी चाहिए; जो लंबित हों, उनके कारण और आगे की समयसीमा सामने आनी चाहिए। इन दस्तावेजों के अभाव में अनियमितता का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। लेकिन सार्वजनिक महत्व की योजना की प्रगति जानने का सवाल अपनी जगह बना रहता है।
संरक्षण की दिशा में आगे बढ़ने के लिए एक स्पष्ट, समयबद्ध कार्ययोजना की जरूरत है। पहले अभिलेखों के आधार पर जलाशय की सीमा और स्थिति दर्ज हो; इसके बाद सत्यापित अतिक्रमण संबंधी मामलों में निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार कार्रवाई हो। कचरा हटाने, दूषित पानी के प्रवेश का समाधान करने और नियमित सफाई के लिए जिम्मेदार विभाग तथा निगरानी व्यवस्था तय हो। कार्ययोजना और प्रगति सार्वजनिक रहने से स्थानीय लोगों को भी पता चलेगा कि संरक्षण किस चरण में है।
जीर्णोद्धार की प्राथमिकता पोखरे के जलाशय स्वरूप को सुरक्षित रखना होनी चाहिए। उसकी जलधारण क्षमता, किनारों की स्थिति और पानी की गुणवत्ता का आकलन इसी उद्देश्य से किया जाए। गाद या जलकुंभी हटाने की जरूरत हो तो तकनीकी जांच के आधार पर काम हो, जिसमें जलीय जीवों और प्राकृतिक स्वरूप का ध्यान रखा जाए। सौंदर्यीकरण के प्रस्ताव भी इस मूल संरक्षण लक्ष्य के अनुरूप तैयार हों।
आदापुर का यह पोखरा अपनी जमीन, पानी और उससे जुड़ी स्मृतियों के साथ बचाया जाना चाहिए। उसके भविष्य का उत्तर योजनाओं की वास्तविक प्रगति, सत्यापित सीमांकन और नियमित रखरखाव में मिलेगा। संरक्षण की गंभीरता तब दिखाई देगी, जब सार्वजनिक विवरण में दर्ज कार्रवाई और पोखरे की स्थिति एक-दूसरे की पुष्टि करें। आने वाली पीढ़ियों के लिए इस धरोहर को सुरक्षित रखने की |
