मानव तस्करी रोकने के लिए स्कूलों से शुरू हुआ अभियान, झाँझरा विद्यालय में एसएसबी ने विद्यार्थियों को बताया कैसे बिछाया जाता है तस्करों का जाल
श्यामल प्रतीक
रक्सौल अनुमंडल रिपोर्टर | चाणक्य न्यूज़ इंडिया
रक्सौल, 30 जुलाई।
भारत–नेपाल की खुली सीमा केवल व्यापार और सांस्कृतिक रिश्तों का माध्यम नहीं है, बल्कि मानव तस्करों के लिए भी लंबे समय से एक संवेदनशील मार्ग रही है। ऐसे में यदि बच्चों और युवाओं को समय रहते जागरूक कर दिया जाए, तो तस्करी की कई घटनाओं को होने से पहले ही रोका जा सकता है। इसी सोच के साथ विश्व मानव व्यापार निषेध दिवस पर 47वीं वाहिनी सशस्त्र सीमा बल (एसएसबी) के “जी” समवाय, बड़हरवा ने झाँझरा उच्च माध्यमिक विद्यालय में एक विशेष जागरूकता अभियान चलाया।
कार्यक्रम में कक्षा 9वीं और 10वीं के विद्यार्थियों तथा शिक्षकों को मानव तस्करी के बदलते तौर-तरीकों, झूठे रोजगार, विवाह, बेहतर भविष्य और विदेश भेजने के नाम पर दिए जाने वाले प्रलोभनों के बारे में विस्तार से जानकारी दी गई। विद्यार्थियों को एक लघु फिल्म भी दिखाई गई, जिसने इस अपराध की भयावह सच्चाई को उनके सामने जीवंत रूप में प्रस्तुत किया।
एसएसबी अधिकारियों ने पिछले दो वर्षों में सीमावर्ती क्षेत्र से बचाए गए बच्चों और पीड़ितों के वास्तविक मामलों का उल्लेख करते हुए बताया कि तस्कर किस प्रकार भोले-भाले लोगों को अपने जाल में फँसाते हैं। पीड़ितों की पहचान गोपनीय रखते हुए यह भी बताया गया कि एसएसबी और गैर-सरकारी संगठनों के संयुक्त प्रयासों से किस प्रकार बचाव अभियान चलाकर पीड़ितों का पुनर्वास कराया जाता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि मानव तस्करी के खिलाफ सबसे प्रभावी हथियार केवल पुलिस कार्रवाई नहीं, बल्कि समाज की जागरूकता है। यदि हर विद्यालय, हर पंचायत और हर परिवार इस विषय पर सजग हो जाए, तो सीमावर्ती क्षेत्रों में इस संगठित अपराध की कमर तोड़ी जा सकती है।
झाँझरा विद्यालय का यह अभियान केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि यह संदेश है कि मानव तस्करी के खिलाफ लड़ाई सीमा पर तैनात जवानों के साथ-साथ समाज के हर जागरूक नागरिक की भी जिम्मेदारी है। यही जागरूकता आने वाली पीढ़ियों को सुरक्षित भविष्य दे सकती है।
