80 साल पुराने दस्तावेज, अदालतों के फैसले और 600 से अधिक रैयतदारों की दावेदारी—रक्सौल में बेतिया राज की जमीन पर गहराया विवाद

1946 की खरीद से लेकर जिला न्यायालय और पटना हाईकोर्ट तक पहुंची जमीन की कानूनी लड़ाई; डीएम के समक्ष दस्तावेज लेकर पहुंचे रक्सौल के तीन वार्डों के रैयतदार, न्यायसंगत कार्रवाई की मांग

विशेष रिपोर्ट | श्यामल प्रतीक | रक्सौल अनुमंडल रिपोर्टर
चाणक्य न्यूज़ इंडिया

रक्सौल। बेतिया राज की संपत्तियों को लेकर चल रही सरकारी प्रक्रिया के बीच रक्सौल में जमीन के अधिकार का एक गंभीर मामला सामने आया है। नगर परिषद क्षेत्र के वार्ड संख्या 9, 10 और 11 के 600 से अधिक रैयतदारों ने अपने पुराने दस्तावेजों और न्यायिक आदेशों के आधार पर प्रशासन के समक्ष अपना पक्ष रखा है।

मामले की गंभीरता इसलिए बढ़ जाती है क्योंकि इसकी जड़ें करीब आठ दशक पीछे जाती हैं और इससे जुड़े एक भूखंड की कानूनी लड़ाई जिला न्यायालय से होते हुए पटना उच्च न्यायालय तक पहुंच चुकी है।

रैयतदारों का प्रतिनिधिमंडल मोतिहारी पहुंचा और जिलाधिकारी सौरभ सुमन यादव तथा अपर समाहर्ता मुकेश कुमार सिन्हा के समक्ष अपना पक्ष रखा। प्रतिनिधियों ने बिहार सरकार की बेतिया राज संपत्तियों से संबंधित वर्तमान प्रक्रिया के संदर्भ में अपने दस्तावेज सौंपते हुए मांग की कि किसी भी कार्रवाई से पहले उनके अभिलेखों और पूर्व न्यायिक आदेशों का विधिसम्मत परीक्षण किया जाए।

कहानी की जड़ 1946 में

रैयतदारों की ओर से प्रो. (डॉ.) अनिल कुमार सिन्हा, प्रो. (डॉ.) चंद्रमा सिंह और रामचंद्र सिंह ने प्रशासन के समक्ष पुराने दस्तावेजों का हवाला देते हुए अपनी दावेदारी रखी।

प्रतिनिधियों के मुताबिक, स्वर्गीय जयकिशन राम से संबंधित जमीन की खरीद 26 अप्रैल 1946 को बैंक ऑफ बिहार के माध्यम से हुई थी। उनका दावा है कि करीब 7 बीघा 13 कट्ठा 6 धुर जमीन 34 हजार रुपये में खरीदी गई थी और इससे संबंधित पुराने दस्तावेज आज भी उपलब्ध हैं।

रैयतदारों ने खाता संख्या 4, 6, 19, 23, 30, 67, 96, 107, 127 और 815 तथा विभिन्न खेसरों से जुड़े अभिलेख प्रशासन के समक्ष प्रस्तुत किए हैं।

हालांकि इन सभी भूखंडों और वर्तमान सभी रैयतदारों की कानूनी स्थिति का निर्धारण संबंधित मूल अभिलेखों और न्यायिक आदेशों से मिलान के बाद ही किया जा सकता है।

Title Suit 189/1989 बना कानूनी लड़ाई का महत्वपूर्ण अध्याय

उपलब्ध पटना हाईकोर्ट के फैसले से इस मामले से जुड़ी महत्वपूर्ण न्यायिक पृष्ठभूमि सामने आती है।

हाईकोर्ट के निर्णय के मुताबिक, मौजा रक्सौल के खाता संख्या 6, खेसरा संख्या 810 की 17 कट्ठा 17 धुर जमीन को लेकर जगमोहन लाल ने मोतिहारी के Sub-Judge की अदालत में Title Suit No. 189 of 1989 दायर किया था।

Sub-Judge-III, Motihari ने 1 अगस्त 1994 को फैसला दिया और 11 अगस्त 1994 को डिक्री तैयार हुई। न्यायालय ने संबंधित जमीन पर जगमोहन लाल के right, title and interest को स्वीकार किया।

बेतिया राज की अपील भी हुई थी खारिज

उक्त निर्णय को बेतिया राज ने Title Appeal No. 68 of 1994 के माध्यम से चुनौती दी थी।

पटना हाईकोर्ट के 2023 के फैसले में दर्ज न्यायिक इतिहास के मुताबिक यह अपील 7 मई 2004 को खारिज हो गई थी। इसके बाद restoration petition भी खारिज हुई थी।

इस न्यायिक इतिहास का वर्तमान विवाद में महत्व इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि रैयतदार पुराने सिविल कोर्ट के निर्णयों को अपनी दावेदारी के महत्वपूर्ण आधारों में शामिल कर रहे हैं।

2014 की याचिका और 2023 का पटना हाईकोर्ट का फैसला

इसके बाद मामला पटना उच्च न्यायालय तक पहुंचा।

Sevak Sanjay Nath vs. State of Bihar & Others, CWJC No. 37 of 2014 में पटना हाईकोर्ट ने 8 सितंबर 2023 को अपना फैसला सुनाया।

इस मामले में बिहार सरकार, पूर्वी चंपारण के जिलाधिकारी और बेतिया एस्टेट सहित अन्य पक्षकार थे।

हाईकोर्ट ने पूर्व की न्यायिक कार्यवाही का परीक्षण करते हुए पूर्वी चंपारण के तत्कालीन कलेक्टर द्वारा 26 अगस्त 2013 को पारित आदेश को कानून के विपरीत पाते हुए रद्द कर दिया और writ petition को स्वीकार किया।

हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में यह भी दर्ज किया कि Title Suit No.189/1989 में पारित 1994 का निर्णय किसी उच्च न्यायालय द्वारा निरस्त नहीं किया गया था।

लेकिन हाईकोर्ट के फैसले को समझने में जरूरी है कानूनी सावधानी

इस पूरे मामले में एक महत्वपूर्ण अंतर समझना आवश्यक है।

CWJC No.37/2014 में पटना हाईकोर्ट के समक्ष विवाद खाता संख्या 6, खेसरा संख्या 810 से संबंधित विशिष्ट जमीन और संबंधित पक्षकारों का था। इसलिए उस फैसले को वार्ड 9, 10 और 11 के सभी 600 से अधिक रैयतदारों तथा उनके प्रत्येक भूखंड पर स्वतः लागू मान लेना उचित नहीं होगा।

प्रत्येक दावेदार की जमीन की प्रकृति, title chain, खाता-खेसरा, खरीद के दस्तावेज और पुराने न्यायिक आदेशों से उसका संबंध अलग-अलग परीक्षण का विषय हो सकता है।

यही तथ्य वर्तमान प्रशासनिक प्रक्रिया को बेहद संवेदनशील बनाता है।

अब बदला हुआ है बेतिया राज संपत्तियों का कानूनी परिदृश्य

बेतिया राज की संपत्तियों को लेकर बिहार में नया वैधानिक ढांचा अस्तित्व में आने के बाद पुराने निजी दावों और सरकारी रिकॉर्ड के परीक्षण का महत्व और बढ़ गया है।

ऐसी स्थिति में रक्सौल का यह मामला केवल यह तय करने तक सीमित नहीं रह जाता कि किसी पुराने अभिलेख में जमीन किस नाम से दर्ज थी। जहां पुराने खरीद दस्तावेज, सिविल कोर्ट की डिक्री और हाईकोर्ट के आदेश प्रस्तुत किए जा रहे हों, वहां प्रत्येक संबंधित भूखंड की कानूनी स्थिति का समग्र परीक्षण महत्वपूर्ण हो जाता है।

रैयतदारों की मांग—दस्तावेजों की जांच के बाद हो कार्रवाई

रैयतदारों का कहना है कि वे सरकारी प्रक्रिया में बाधा नहीं चाहते। उनकी मांग है कि किसी भी निष्कर्ष या कार्रवाई से पहले उनके पास उपलब्ध पुराने दस्तावेज, राजस्व अभिलेख और संबंधित न्यायिक आदेशों को देखा जाए तथा उन्हें अपना पक्ष रखने का पूरा अवसर मिले।

प्रतिनिधियों के मुताबिक मामले से संबंधित प्रतिवेदन राज्यपाल, राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग के सचिव, अनुमंडल पदाधिकारी रक्सौल तथा अंचलाधिकारी रक्सौल को भी भेजा जा रहा है।

600 से अधिक रैयतदारों की चिंता, जनप्रतिनिधि भी साथ

मोतिहारी पहुंचे प्रतिनिधिमंडल में स्थानीय जनप्रतिनिधियों की भी मौजूदगी रही।

वार्ड पार्षद रवि गुप्ता, वार्ड पार्षद कुंदन सिंह, राजेश गुप्ता, मुंद्रिका सिंह, नवीन कुमार सिंह, मुद्रिका सिंह, बैकुंठ बिहारी सिंह, प्रेम शंकर तिवारी और अजय चौरसिया सहित तीनों वार्डों के सैकड़ों रैयतदारों ने प्रशासन के समक्ष न्यायसंगत कार्रवाई की मांग रखी।

इतनी बड़ी संख्या में लोगों की दावेदारी सामने आने के कारण प्रशासन के किसी भी निर्णय का सामाजिक और आर्थिक प्रभाव व्यापक हो सकता है।

दस्तावेजों की कसौटी पर तय हो अधिकार

बेतिया राज की संपत्तियों की सुरक्षा सरकार की जिम्मेदारी है। उसी तरह वैध दस्तावेजों और न्यायिक आदेशों से स्थापित निजी अधिकारों का संरक्षण भी कानून के शासन का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

रक्सौल का यह मामला इसलिए असाधारण है क्योंकि यहां इतिहास, राजस्व रिकॉर्ड और न्यायिक फैसले एक ही जमीन की कहानी के अलग-अलग अध्याय बनकर सामने खड़े हैं।

करीब 80 वर्ष पुराने दस्तावेजों से शुरू हुई यह कहानी अब एक बार फिर प्रशासन की चौखट पर है।

अब आवश्यकता इस बात की है कि सरकारी रिकॉर्ड और रैयतदारों द्वारा प्रस्तुत दस्तावेजों का भूखंडवार परीक्षण हो, पूर्व न्यायिक आदेशों की वर्तमान कानूनी स्थिति देखी जाए और उसके बाद ही किसी निष्कर्ष तक पहुंचा जाए।

क्योंकि 600 से अधिक लोगों से जुड़े इस मामले में सवाल केवल जमीन का नहीं है—सवाल यह भी है कि दशकों पुराने दस्तावेजों और अदालतों से होकर गुजरे अधिकारों को वर्तमान व्यवस्था किस तरह कानून की कसौटी पर परखती है।

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