दशकों का भरोसा, भविष्य की साझेदारी: भारत–रूस दोस्ती की एक और मजबूत कड़ी

नई दिल्ली में दोनों देशों के प्रतिनिधियों की बैठक; 2026 की साझी गतिविधियों की समीक्षा और 2027 के लिए आगे की दिशा पर चर्चा

विशेष कवर स्टोरी | श्यामल प्रतीक | ग्लोबल डेस्क

नई दिल्ली। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में समीकरण बदलते रहते हैं, परिस्थितियां बदलती हैं और देशों की प्राथमिकताएं भी समय के साथ नई दिशा लेती हैं। लेकिन भारत और रूस के रिश्ते की विशेषता इसकी निरंतरता रही है। दशकों में विकसित हुआ यह संबंध आज भी आपसी भरोसे, राष्ट्रीय हितों के सम्मान और दीर्घकालिक साझेदारी पर टिका दिखाई देता है।

इसी संबंध की एक नई कड़ी 20 और 21 अगस्त को नई दिल्ली में देखने को मिली, जहां रूस–भारत अंतर-सरकारी आयोग के सैन्य एवं सैन्य-तकनीकी सहयोग से संबंधित प्लानिंग वर्किंग ग्रुप की बैठक हुई।

बैठक में दोनों पक्षों ने वर्ष 2026 के लिए निर्धारित संयुक्त गतिविधियों की प्रगति की समीक्षा की, वर्ष 2027 के लिए प्रस्तावित कदमों पर विचार किया और दोनों देशों के सशस्त्र बलों के बीच संस्थागत संपर्क एवं सहयोग को आगे बढ़ाने के विषयों पर चर्चा की।

लेकिन इस बैठक का महत्व केवल दो दिनों की बातचीत तक सीमित नहीं है। इसे उस लंबे भारत–रूस संबंध की निरंतरता के रूप में भी देखा जा सकता है, जिसकी जड़ें पिछली सदी तक जाती हैं।

1971: जब दोस्ती को मिला ऐतिहासिक आधार

भारत और तत्कालीन सोवियत संघ के रिश्तों के इतिहास में 9 अगस्त 1971 एक महत्वपूर्ण तारीख है। इसी दिन नई दिल्ली में दोनों देशों ने शांति, मित्रता और सहयोग की संधि पर हस्ताक्षर किए थे।

उस संधि में दोनों पक्षों ने एक-दूसरे की स्वतंत्रता, संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता के सम्मान तथा आपसी लाभ के आधार पर व्यापक सहयोग विकसित करने की प्रतिबद्धता व्यक्त की थी।

वर्षों बाद सोवियत संघ के विघटन और वैश्विक व्यवस्था में व्यापक परिवर्तन के बावजूद भारत और रूस के रिश्तों की बुनियाद समाप्त नहीं हुई। दोनों देशों ने नई परिस्थितियों के अनुरूप इसे आगे बढ़ाया।

2000 से रिश्ते का नया अध्याय

अक्टूबर 2000 में भारत और रूस के बीच रणनीतिक साझेदारी की घोषणा ने द्विपक्षीय संबंधों को एक नया संस्थागत स्वरूप दिया।

इसके बाद राजनीतिक संवाद से लेकर व्यापार, अर्थव्यवस्था, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, संस्कृति और लोगों के बीच संपर्क तक सहयोग का दायरा विस्तृत होता गया।

दिसंबर 2010 में इस संबंध को और ऊंचा उठाते हुए इसे “विशेष एवं विशेषाधिकार प्राप्त रणनीतिक साझेदारी” — Special and Privileged Strategic Partnership का दर्जा दिया गया।

यही कारण है कि आज भारत–रूस संबंध को केवल किसी एक क्षेत्र के सहयोग से परिभाषित करना अधूरा होगा।

रक्षा से आगे भी बहुत बड़ी है साझेदारी

भारत और रूस के बीच रक्षा सहयोग निश्चित रूप से रिश्तों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है, लेकिन दोनों देशों की साझेदारी इससे कहीं व्यापक है।

ऊर्जा, व्यापार, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष, शिक्षा, संस्कृति और लोगों के बीच संपर्क जैसे क्षेत्र इस रिश्ते को बहुआयामी बनाते हैं।

दोनों देशों के बीच नियमित उच्चस्तरीय संवाद और विभिन्न अंतर-सरकारी तंत्र इस बात को दर्शाते हैं कि संबंध केवल शीर्ष नेतृत्व की मुलाकातों पर निर्भर नहीं हैं, बल्कि उन्हें आगे बढ़ाने के लिए एक विस्तृत संस्थागत ढांचा भी मौजूद है।

बदलती दुनिया में पुराना भरोसा

आज की दुनिया 1971 या 2000 की दुनिया जैसी नहीं है। वैश्विक शक्ति-संतुलन बदल चुका है। नई आर्थिक और रणनीतिक साझेदारियां उभरी हैं और दोनों देशों के अपने-अपने राष्ट्रीय हित भी विकसित हुए हैं।

इसके बावजूद भारत और रूस ने अपने संबंधों को जारी रखा है।

यही इस रिश्ते की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक है—मतभेदों या बदलती अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों के बीच भी संवाद की निरंतरता।

भारत अपनी रणनीतिक स्वायत्तता के अनुरूप विभिन्न देशों के साथ संबंध विकसित करता है, जबकि रूस के भी अपने वैश्विक हित हैं। ऐसे वातावरण में भारत–रूस संबंध का टिके रहना बताता है कि यह साझेदारी केवल तत्कालीन परिस्थितियों पर आधारित नहीं है।

नई दिल्ली की बैठक का संदेश

20–21 अगस्त की बैठक को इसी व्यापक संदर्भ में देखना अधिक उचित होगा।

वर्ष 2026 की गतिविधियों की समीक्षा और 2027 के लिए आगे की योजना तैयार करना बताता है कि दोनों देश अपने संबंधों को केवल अतीत की उपलब्धियों के आधार पर नहीं देख रहे, बल्कि भविष्य के लिए भी संस्थागत संवाद बनाए रखना चाहते हैं।

यह बैठक किसी नए रिश्ते की शुरुआत नहीं, बल्कि दशकों से चले आ रहे संबंध की अगली कड़ी है।

🇮🇳🤝🇷🇺 दोस्ती जो इतिहास से भविष्य की ओर बढ़ रही है

भारत और रूस के रिश्तों की कहानी में 1971 की ऐतिहासिक संधि है, 2000 की रणनीतिक साझेदारी है और 2010 में उसे मिले विशेष एवं विशेषाधिकार प्राप्त रणनीतिक साझेदारी के दर्जे की निरंतरता भी है।

आज दोनों देश नई वैश्विक परिस्थितियों में अपनी-अपनी प्राथमिकताओं के साथ आगे बढ़ रहे हैं। इसलिए भारत–रूस संबंधों का मूल्यांकन केवल भावनाओं से नहीं, बल्कि उनके दीर्घकालिक कूटनीतिक और रणनीतिक महत्व को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए।

फिर भी इतिहास एक महत्वपूर्ण तथ्य दर्ज करता है—भारत और रूस के बीच संबंध अनेक वैश्विक बदलावों से गुजरने के बावजूद बने रहे हैं।

नई दिल्ली की यह बैठक उसी निरंतरता का नवीन अध्याय है।

दुनिया बदली है, समीकरण बदले हैं और चुनौतियां भी बदली हैं—लेकिन भारत और रूस के बीच दशकों में बना संवाद और भरोसा आज भी दोनों देशों को एक महत्वपूर्ण साझेदारी में जोड़े हुए है।

🇮🇳 भारत–रूस 🇷🇺
इतिहास में मित्रता, वर्तमान में साझेदारी और भविष्य के लिए संवाद।

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