जन्मभूमि नेपाल, कर्मभूमि भारत—कारगिल की चोटियों पर अमर हुआ गोरखा योद्धा

हवलदार भीम बहादुर दीवान: इलाम की पहाड़ियों से खालूबार के रण तक पहुंची वह शौर्यगाथा, जिसने भारत-नेपाल के ऐतिहासिक सैन्य रिश्ते को अपने बलिदान से और गहरा कर दिया

1/11 गोरखा राइफल्स के जांबाज ने बटालिक सेक्टर में दिखाया अदम्य साहस; 3 जुलाई 1999 को मातृभूमि की रक्षा करते हुए दिया सर्वोच्च बलिदान, राष्ट्र ने मरणोपरांत वीर चक्र से किया सम्मानित

विशेष कवर स्टोरी | श्यामल प्रतीक
चाणक्य न्यूज़ इंडिया

कारगिल की बर्फीली चोटियों पर 1999 में केवल एक युद्ध नहीं लड़ा गया था।

वहां साहस की ऐसी इबारत लिखी गई थी, जिसे समय कभी मिटा नहीं सकता।

द्रास से बटालिक तक भारतीय सैनिक दुर्गम पहाड़ों पर आगे बढ़ रहे थे। सामने कठिन भूभाग और युद्ध की चुनौती थी, लेकिन उनके पीछे एक पूरा देश खड़ा था।

इन्हीं योद्धाओं के बीच एक गोरखा सैनिक भी था, जिसकी कहानी भारत की सीमाओं से आगे नेपाल की पहाड़ियों तक पहुंचती है—

हवलदार भीम बहादुर दीवान, वीर चक्र।

नेपाल के इलाम में जन्मे इस सैनिक ने भारतीय सेना की वर्दी पहनी और अंततः कारगिल की चोटियों पर अपना सर्वोच्च बलिदान देकर इतिहास में अमर हो गए।

उनकी कहानी सिर्फ एक सैनिक की कहानी नहीं है।

यह नेपाल की मिट्टी से निकले उस बेटे की कहानी है, जिसने भारतीय सेना की गोरखा परंपरा में अपना जीवन समर्पित किया और कारगिल के रण में साहस की अमिट छाप छोड़ गया।

इलाम की पहाड़ियों से शुरू हुआ सफर

5 जून 1961।

नेपाल के खूबसूरत पहाड़ी क्षेत्र इलाम में भीम बहादुर दीवान का जन्म हुआ।

शायद तब किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी कि इसी पहाड़ी धरती से निकला यह बालक एक दिन हिमालय की दूसरी कठिन चोटियों पर युद्ध लड़ते हुए इतिहास का हिस्सा बनेगा।

युवा अवस्था में उन्होंने सैन्य जीवन चुना।

भारतीय सेना की प्रतिष्ठित 11 गोरखा राइफल्स की 1/11 GR बटालियन उनकी सैन्य पहचान बनी।

वर्षों की सेवा ने उन्हें केवल अनुभवी सैनिक ही नहीं बनाया, बल्कि जवानों का नेतृत्व करने वाला एक जिम्मेदार सेक्शन कमांडर भी बनाया।

फिर आया वर्ष 1999।

और इतिहास ने उन्हें कारगिल बुला लिया।

जब हिमालय की चोटियों पर युद्ध छिड़ा

कारगिल क्षेत्र में घुसपैठ सामने आने के बाद भारतीय सेना ने ऑपरेशन विजय शुरू किया।

यह सामान्य युद्धभूमि नहीं थी।

ऊंचे पर्वत, दुर्गम रास्ते और अत्यंत कठिन परिस्थितियां भारतीय सैनिकों की परीक्षा ले रही थीं।

बटालिक सेक्टर में 1/11 गोरखा राइफल्स को महत्वपूर्ण सैन्य जिम्मेदारी मिली।

इसी बटालियन के साथ थे युवा अधिकारी लेफ्टिनेंट मनोज कुमार पांडेय, जिन्हें उनके असाधारण पराक्रम और सर्वोच्च बलिदान के लिए बाद में मरणोपरांत परमवीर चक्र प्रदान किया गया।

और उसी रणभूमि में उनके साथ लड़ रहे थे—

हवलदार भीम बहादुर दीवान।

एक युवा अधिकारी और एक अनुभवी हवलदार।

अलग-अलग जिम्मेदारियां थीं, लेकिन लक्ष्य एक था—

हर हाल में मिशन पूरा करना।

खालूबार—जहां गोरखाओं ने इतिहास लिखा

2 और 3 जुलाई 1999 की रात कारगिल युद्ध के उन अध्यायों में शामिल है जिन्हें भारतीय सैन्य इतिहास हमेशा याद रखेगा।

लक्ष्य था—खालूबार रिज।

1/11 गोरखा राइफल्स के जवान कठिन पर्वतीय क्षेत्र में आगे बढ़ रहे थे।

हवलदार भीम बहादुर दीवान अपने सेक्शन का नेतृत्व कर रहे थे।

युद्धभूमि में नेतृत्व का अर्थ केवल आदेश देना नहीं होता।

उसका अर्थ होता है—खतरा सामने हो तो अपने जवानों के साथ खड़ा रहना।

दीवान ने वही किया।

उन्होंने अभियान के दौरान असाधारण साहस और कर्तव्यनिष्ठा का परिचय दिया और अपने साथियों के साथ लक्ष्य की ओर बढ़ते रहे।

फिर आया 3 जुलाई 1999।

कारगिल की उसी रणभूमि पर हवलदार भीम बहादुर दीवान ने अपना सर्वोच्च बलिदान दे दिया।

एक सैनिक का जीवन थम गया था—

लेकिन एक शौर्यगाथा जन्म ले चुकी थी।

वीर चक्र—राष्ट्र ने अपने योद्धा को किया सलाम

उनका बलिदान इतिहास में गुम नहीं हुआ।

युद्धभूमि में प्रदर्शित वीरता और कर्तव्यनिष्ठा के लिए हवलदार भीम बहादुर दीवान को मरणोपरांत वीर चक्र प्रदान किया गया।

यह सम्मान उस सैनिक के साहस की राष्ट्रीय स्वीकृति थी जिसने अपने कर्तव्य को जीवन से ऊपर रखा।

लेकिन किसी सैनिक की विरासत केवल उसके पदक तक सीमित नहीं होती।

उसकी असली विरासत उन पीढ़ियों में जीवित रहती है, जो उसकी कहानी पढ़कर समझती हैं कि देश की सुरक्षा के पीछे कितने अनदेखे चेहरे और कितने परिवारों के बलिदान जुड़े होते हैं।

एक बलिदान, दो देशों को छूती कहानी 🇮🇳🤝🇳🇵

हवलदार भीम बहादुर दीवान की कहानी कारगिल के अनेक वीरों के बीच एक अलग भावनात्मक स्थान रखती है।

उनका जन्म नेपाल में हुआ।
उनकी सैन्य पहचान भारतीय सेना बनी।
और उनका नाम कारगिल के इतिहास में दर्ज हो गया।

भारत और नेपाल का रिश्ता केवल खुली सीमा, व्यापार या कूटनीति तक सीमित नहीं है।

दोनों देशों के लोगों के बीच सदियों पुराने सामाजिक, सांस्कृतिक और पारिवारिक संबंध हैं। गोरखा सैनिकों की सैन्य परंपरा इस रिश्ते का एक विशिष्ट ऐतिहासिक अध्याय रही है।

हवलदार भीम बहादुर दीवान उसी विरासत के एक अमर प्रतिनिधि हैं।

उनकी कहानी मानचित्र पर खींची सीमा से आगे जाकर उस साझा इतिहास को छूती है जिसमें साहस, सेवा और बलिदान की अपनी भाषा होती है।

जिसे इतिहास के हाशिये पर नहीं रहने देना चाहिए

कारगिल विजय की चर्चा होते ही कई महान योद्धाओं के नाम हमारी स्मृति में आते हैं।

लेकिन उस विजय के पीछे ऐसे अनेक सैनिक भी थे जिनकी शौर्यगाथा आम लोगों तक उतनी व्यापकता से नहीं पहुंच सकी।

हवलदार भीम बहादुर दीवान उन्हीं में से एक हैं।

कारगिल की विजय किसी एक व्यक्ति की विजय नहीं थी।

यह अधिकारियों, जवानों, तोपखाने, वायुसेना और हर उस सैनिक के सामूहिक साहस की विजय थी जिसने असंभव दिखाई देने वाली परिस्थितियों में अपना कर्तव्य निभाया।

इसलिए कारगिल के इतिहास को पूर्ण रूप से समझने के लिए उन अपेक्षाकृत कम चर्चित योद्धाओं की कहानियां भी सामने लानी होंगी।

श्यामल प्रतीक की कलम से

कुछ रिश्ते सरकारें बनाती हैं।

कुछ समझौते बनाते हैं।

और कुछ रिश्ते इतिहास अपने आप लिख देता है।

हवलदार भीम बहादुर दीवान की कहानी मुझे भारत और नेपाल के उसी ऐतिहासिक रिश्ते की याद दिलाती है।

नेपाल के इलाम की पहाड़ियों में जन्मा एक बेटा भारतीय सेना की गोरखा राइफल्स का सैनिक बना। वर्षों तक वर्दी का सम्मान निभाया और जब कारगिल ने उसकी परीक्षा ली, तो वह पीछे नहीं हटा।

अंततः खालूबार की रणभूमि ने उस सैनिक को हमसे छीन लिया—

लेकिन इतिहास ने उसे हमेशा के लिए अपना बना लिया।

आज इलाम और कारगिल के बीच हजारों किलोमीटर की दूरी हो सकती है।

मगर हवलदार भीम बहादुर दीवान की कहानी उन दोनों जगहों को एक अदृश्य धागे से जोड़ देती है।

एक तरफ जन्मभूमि की पहाड़ियां।

दूसरी तरफ वह रणभूमि, जहां उन्होंने अंतिम बार सैनिक का धर्म निभाया।

और इन दोनों के बीच—

एक गोरखा योद्धा की अमर शौर्यगाथा।

जब भी कारगिल विजय की कहानी लिखी जाए, प्रसिद्ध नामों के साथ इस सैनिक का नाम भी पूरे सम्मान से लिया जाना चाहिए—

हवलदार भीम बहादुर दीवान

वीर चक्र (मरणोपरांत)

इलाम का बेटा।
गोरखा राइफल्स का योद्धा।
कारगिल का वीर।
और इतिहास में हमेशा के लिए अमर। 🇮🇳

कारगिल: श्यामल प्रतीक की नज़र से

इस विशेष श्रृंखला का उद्देश्य केवल कारगिल के चर्चित नायकों को याद करना नहीं, बल्कि उन अपेक्षाकृत कम चर्चित सैनिकों की शौर्यगाथाओं को भी सामने लाना है, जिनके साहस और सर्वोच्च बलिदान ने ऑपरेशन विजय को संभव बनाया।

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