‘स्वच्छ रक्सौल’ संस्था के संस्थापक रणजीत सिंह ने शुरू किया ‘बुजुर्ग आनन्द आश्रम’; भोजन, वस्त्र, आवास और दवा के साथ सम्मानपूर्ण जीवन का सहारा देने का संकल्प
विशेष रिपोर्ट | श्यामल प्रतीक
रक्सौल, रोटी समय पर मिल जाए, दवा के लिए भटकना न पड़े, रात सिर पर सुरक्षित छत हो और सुबह कोई हाल पूछ ले—उम्र के आखिरी पड़ाव में ये साधारण लगने वाली बातें जीवन की बड़ी राहत बन जाती हैं। जिन बुजुर्गों के पास यह सहारा भी नहीं है, उनके लिए ‘स्वच्छ रक्सौल’ संस्था के संस्थापक रणजीत सिंह ने रविवार को रक्सौल में ‘बुजुर्ग आनन्द आश्रम’ की शुरुआत की।
रणजीत सिंह द्वारा आश्रम खोलना बुजुर्गों की जरूरतों को एक संगठित सेवा-व्यवस्था से जोड़ने की पहल है। इसका उद्देश्य उन लोगों के लिए सुरक्षित आश्रय और देखभाल का सहारा जुटाना है, जिन्हें अपने जीवन के इस पड़ाव में मदद की जरूरत है। उनकी इस पहल ने बुजुर्गों की गरिमा और अपनेपन की जरूरत को समाज के सामने रखा है।
सामाजिक कार्यकर्ता बिमल सर्राफ, डॉ. सुशील कुमार सिंह, बबन प्रसाद, अजय कुमार और उर्मिला देवी ने संयुक्त रूप से फीता काटकर आश्रम का उद्घाटन किया। इस शुरुआत के साथ उन बुजुर्गों को सहारा देने का संकल्प सामने आया, जो परिवार से बिछड़ने, अपनों की उपेक्षा अथवा आर्थिक तंगी के कारण बेसहारा जीवन जी रहे हैं।
इस पहल का सबसे संवेदनशील पक्ष उसका उद्देश्य है। एक बुजुर्ग के लिए रहने की जगह मिलने का अर्थ जीवन में कुछ निश्चितता लौटना भी है—अगला भोजन कहाँ मिलेगा, रात कहाँ कटेगी और बीमारी में मदद कौन करेगा, इन चिंताओं से राहत। आश्रम का सेवा-संकल्प इसी जरूरत से जुड़ा है।
यहाँ जरूरतमंद बुजुर्गों को भोजन, कपड़े और आवास उपलब्ध कराने के साथ आवश्यक दवाओं तथा स्वास्थ्य संबंधी जरूरतों को पूरा करने का प्रयास किया जाएगा। उनकी देखभाल में सम्मान, सुरक्षा और अपनापन बनाए रखना भी आश्रम के उद्देश्य का हिस्सा है।
बुढ़ापे की तकलीफ समझने के लिए हमें अपने घरों की ओर भी देखना होगा। परिवार की जिम्मेदारियाँ उठाते हुए किसी ने अपनी जरूरतें टाली होंगी, किसी ने बच्चों की पढ़ाई के लिए मेहनत की होगी, किसी ने कम साधनों में सबका पेट भरने की व्यवस्था की होगी। उम्र ढलने पर वही व्यक्ति दूसरों की मदद पर निर्भर हो सकता है। उस निर्भरता को लेकर उसे शर्मिंदा करना उसके जीवन भर के योगदान को चोट पहुँचाना है।
किसी बुजुर्ग को अपनी भूख बताने में संकोच हो, बीमारी का जिक्र करते हुए झिझक हो या रहने की जगह माँगते समय अपमान का डर लगे, तो हमें अपने व्यवहार पर विचार करना चाहिए। उनकी जरूरत सुनते समय धैर्य रखना, उन्हें नाम से बुलाना और निर्णयों में उनकी इच्छा पूछना भी देखभाल का हिस्सा है। उम्र बढ़ने से किसी व्यक्ति का अपने जीवन पर अधिकार छोटा नहीं हो जाता।
बेसहारा होने की हर कहानी अलग हो सकती है। किसी के सामने आर्थिक संकट होता है, कोई परिवार से बिछड़ जाता है और किसी को अपनों की उपेक्षा झेलनी पड़ती है। इसलिए सहायता का हाथ संवेदनशीलता से बढ़ना चाहिए। मदद लेते समय किसी बुजुर्ग को अपनी पूरी जिंदगी का हिसाब देकर यह साबित न करना पड़े कि वह सहारे का पात्र है।
आनन्द आश्रम की भावना बुजुर्गों को उनके अनुभव और जीवन-यात्रा के सम्मान के साथ स्वीकार करने की है। उनके लिए समय पर रखी गई थाली, साफ कपड़े, आराम का बिस्तर और दवा की उपलब्धता दैनिक जीवन को सहज बना सकते हैं। साथ बैठकर उनकी बात सुनने वाला कोई व्यक्ति उस सहजता में अपनेपन की गर्माहट जोड़ सकता है।
जहाँ संभव हो, बुजुर्गों को उनके परिवार से दोबारा मिलाने की दिशा में प्रयास करना भी आश्रम के उद्देश्य में शामिल है। ऐसे प्रयास में बुजुर्ग की इच्छा, सुरक्षा और सम्मान का ध्यान रहना जरूरी है। रिश्तों में लौटने की खुशी तभी टिकेगी, जब वहाँ देखभाल और स्वीकार्यता भी मिले।
अब इस सेवा-संकल्प की सार्थकता रोजमर्रा की व्यवस्था में दिखाई देगी। भूख का समय तय होता है, बीमारी उद्घाटन की तारीख देखकर नहीं आती और अकेलापन समारोह खत्म होने के बाद भी बना रह सकता है। नियमित भोजन, समय पर दवा, साफ-सफाई और धैर्यपूर्वक देखभाल इस पहल को बुजुर्गों के जीवन में भरोसेमंद सहारा बना सकती है।
आश्रम की व्यवस्था सुचारु रखने के लिए प्रबुद्ध नागरिकों, व्यवसायियों, सामाजिक संगठनों और दानदाताओं से सहयोग की अपील की गई है। भोजन, वस्त्र, बिस्तर, दवा और दैनिक जरूरतों में मिलने वाला सहयोग इस प्रयास को आगे बढ़ाने में मदद करेगा। अपनी क्षमता के अनुसार नियमित योगदान देने से सेवा की निरंतरता मजबूत हो सकती है।
इस सहयोग में देने वाले और पाने वाले के बीच सम्मान बना रहना चाहिए। सहायता पाकर किसी बुजुर्ग को अपनापन महसूस हो, संकोच नहीं। सेवा का हाथ ऐसा बढ़े कि सामने वाले को अपना सिर न झुकाना पड़े।
शुभारंभ के अवसर पर अम्बुज गुप्ता, साबरा खातुन, श्वेता श्रीवास्तव, किशु श्रीवास्तव, परमानंद तिवारी, नेहा श्रीवास्तव, जितेंद्र दत्ता, बिपिन बिहारी सिंह, गणेश अग्रवाल, नरेश पटेल, निरंजन वर्मा, जैड अहमद और अनस रेयाज अहमद सहित अन्य गणमान्य लोग उपस्थित रहे।
रणजीत सिंह द्वारा स्थापित आनन्द आश्रम उन बुजुर्गों के लिए उम्मीद लेकर आया है, जिन्हें सहारे की जरूरत है। साथ ही यह हर परिवार के सामने एक जिम्मेदारी रखती है—घर में बुजुर्ग की जगह, उसकी आवाज और उसका सम्मान बना रहे। जिनके पास परिवार का सहारा नहीं बचा है, उनके लिए समाज अपने दरवाजे खोल सके।
जिन हाथों ने हमारी उँगली पकड़कर हमें चलना सिखाया, उम्र ढलने पर उन्हें थाम लेना हमारी जिम्मेदारी है। जिस पीढ़ी ने हमारा बचपन सुरक्षित किया, उसका बुढ़ापा भी सुरक्षित होना चाहिए।
