‘रोटी-बेटी’ के सदियों पुराने रिश्ते से विकास साझेदारी तक; नेपाल की आठ परियोजनाओं के लिए 803 मिलियन नेपाली रुपये की भारतीय सहायता ने फिर रेखांकित की दोनों देशों की विशेष मित्रता
विशेष कवर स्टोरी | श्यामल प्रतीक
रक्सौल अनुमंडल रिपोर्टर | चाणक्य न्यूज़ इंडिया
भारत-नेपाल। दुनिया के नक्शे पर भारत और नेपाल दो संप्रभु राष्ट्र हैं, लेकिन दोनों देशों के लोगों के रिश्तों को केवल अंतरराष्ट्रीय सीमा की रेखा से समझना मुश्किल है।
यह वह सरहद है जहां सीमा के इस पार और उस पार भाषा मिलती है, संस्कृति मिलती है, पर्व-त्योहार मिलते हैं, आस्था के केंद्र जोड़ते हैं, व्यापार जोड़ता है और सबसे बढ़कर परिवारों के रिश्ते एक-दूसरे को जोड़ते हैं।
इसी गहरे सामाजिक और पारिवारिक जुड़ाव को आम बोलचाल में भारत-नेपाल का ‘रोटी-बेटी का रिश्ता’ कहा जाता है।
आज इसी ऐतिहासिक संबंध में विकास साझेदारी का एक और अध्याय जुड़ता दिखाई दे रहा है। उपलब्ध विवरण के अनुसार नेपाल में शिक्षा, स्वास्थ्य और कृषि से जुड़ी आठ विकास परियोजनाओं के लिए 803 मिलियन नेपाली रुपये की भारतीय सहायता प्रस्तावित है। संबंधित एजेंसियों के बीच समझौता ज्ञापन के माध्यम से इन परियोजनाओं को आगे बढ़ाया जाना है।
लेकिन इन आठ परियोजनाओं की कहानी केवल धनराशि की कहानी नहीं है।
इसके पीछे भारत और नेपाल के उस रिश्ते की लंबी यात्रा है, जिसकी जड़ें राजनीति और कूटनीति से कहीं अधिक गहराई तक दोनों देशों के समाज में फैली हुई हैं।
जब सीमा रिश्तों को रोकती नहीं, बल्कि जोड़ती है
भारत और नेपाल के संबंधों की सबसे बड़ी विशेषताओं में उनकी खुली सीमा और गहरे जनस्तरीय संपर्क शामिल हैं। भारत का विदेश मंत्रालय भी दोनों देशों के संबंधों को साझा विरासत, सभ्यता, संस्कृति और व्यापक जनसंपर्क में निहित एक विशेष संबंध के रूप में वर्णित करता है।
बिहार, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पश्चिम बंगाल और सिक्किम से सटे नेपाली क्षेत्रों में यह रिश्ता रोजमर्रा के जीवन में दिखाई देता है।
लोग रोजगार और व्यापार के लिए सीमा पार करते हैं। परिवारों के बीच वैवाहिक संबंध हैं। धार्मिक यात्राएं और पर्व-त्योहार दोनों तरफ के लोगों को एक-दूसरे से जोड़ते हैं।
यही कारण है कि ‘रोटी-बेटी’ महज एक राजनीतिक मुहावरा नहीं, बल्कि सीमा पर रहने वाले हजारों परिवारों के जीवन की सामाजिक वास्तविकता का प्रतीक है।
जनकपुर से अयोध्या, पशुपतिनाथ से काशी तक
भारत-नेपाल के रिश्ते को धार्मिक और सांस्कृतिक भूगोल भी विशिष्ट बनाता है।
नेपाल का जनकपुर माता सीता की परंपरा से जुड़ा है तो भारत की अयोध्या भगवान राम से। नेपाल का पशुपतिनाथ हिंदू आस्था के प्रमुख केंद्रों में है, जबकि भारत में काशी और अन्य तीर्थस्थलों से नेपाली श्रद्धालुओं का पुराना जुड़ाव रहा है। बौद्ध परंपरा भी दोनों देशों को गहराई से जोड़ती है—नेपाल का लुंबिनी और भारत के बोधगया तथा सारनाथ जैसे स्थल इस साझा आध्यात्मिक विरासत की महत्वपूर्ण कड़ियां हैं।
इसीलिए भारत और नेपाल की मित्रता को केवल आधुनिक कूटनीतिक संबंधों के संदर्भ में देखना इसकी पूरी तस्वीर नहीं दिखाता।
1950: आधुनिक संबंधों का महत्वपूर्ण पड़ाव
भारत और नेपाल के आधुनिक द्विपक्षीय संबंधों में 31 जुलाई 1950 की शांति एवं मैत्री संधि एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक पड़ाव रही है। संधि में दोनों देशों के बीच शांति और मित्रता तथा एक-दूसरे की संप्रभुता, क्षेत्रीय अखंडता और स्वतंत्रता के सम्मान की बात दर्ज है।
लेकिन दोनों देशों का सामाजिक रिश्ता इस संधि से कहीं पुराना है।
सीमा के दोनों ओर बसे समुदायों के बीच विवाह, व्यापार, धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक परंपराओं ने ऐसा मानवीय नेटवर्क बनाया है, जो सरकारी समझौतों से आगे जाकर दोनों देशों के संबंधों की बुनियाद बनता है।
मुश्किल समय में भी साथ
दोस्ती की वास्तविक परीक्षा संकट में होती है और भारत-नेपाल संबंधों में आपदा के समय सहयोग इसकी महत्वपूर्ण मिसाल रहा है।
2015 के विनाशकारी भूकंप के बाद भारत ने नेपाल के पुनर्निर्माण में व्यापक सहयोग किया। भारत के सहयोग से गोरखा और नुवाकोट में 50 हजार निजी घरों, आठ जिलों में 85 शैक्षणिक संस्थानों और 11 जिलों में 133 स्वास्थ्य सुविधाओं के पुनर्निर्माण को समर्थन दिया गया। इसके अलावा आठ जिलों में 30 सांस्कृतिक विरासत स्थलों के संरक्षण और पुनर्निर्माण में भी भारत ने सहयोग किया।
यह सहयोग बताता है कि भारत-नेपाल विकास साझेदारी केवल बड़ी परियोजनाओं तक सीमित नहीं रही, बल्कि घर, विद्यालय, अस्पताल और सांस्कृतिक धरोहर तक पहुंची है।
सड़क से रेल तक बढ़ती साझेदारी
समय के साथ भारत की नेपाल के साथ विकास साझेदारी का दायरा बुनियादी ढांचे, स्वास्थ्य, शिक्षा, सिंचाई, आजीविका और कनेक्टिविटी तक विस्तृत हुआ है। भारत सरकार ने नेपाल में सड़क, एकीकृत जांच चौक और सीमा-पार रेलवे जैसी परियोजनाओं को भी सहयोग दिया है।
जून 2026 में भी दोनों देशों ने जयनगर-बिजलपुरा-बर्दिबास और जोगबनी-विराटनगर ब्रॉडगेज रेलवे परियोजनाओं की प्रगति की समीक्षा की। इसी वार्ता में रक्सौल-काठमांडू प्रस्तावित ब्रॉडगेज रेलवे लिंक की फाइनल लोकेशन सर्वे रिपोर्ट सहित रेल सहयोग के दूसरे पहलुओं पर चर्चा हुई।
सीमा क्षेत्र के लिए इसका विशेष महत्व है, क्योंकि बेहतर कनेक्टिविटी केवल माल और यात्रियों को नहीं जोड़ती—वह दोनों देशों की अर्थव्यवस्थाओं और लोगों के संपर्क को भी करीब लाती है।
अब आठ परियोजनाएं, सीधे आम लोगों से जुड़ा विकास
वर्तमान पहल की खासियत यह है कि प्रस्तावित आठ परियोजनाएं सीधे स्थानीय आवश्यकताओं से जुड़ी हैं।
सुनसरी में स्वास्थ्य संस्थान का डिजिटलीकरण और 15 बेड का अस्पताल भवन, भोजपुर में कृषि उत्पाद संग्रह एवं बिक्री केंद्र, धादिंग में नगर कृषि एवं पशुपालन केंद्र, मोरंग में बेलबारी मल्टीपल कैंपस भवन, दैलेख में 10 बेड का अस्पताल, जुमला में कृषि प्रोत्साहन केंद्र तथा स्यांगजा में कोल्ड स्टोर जैसी परियोजनाएं शिक्षा, स्वास्थ्य और कृषि के बुनियादी ढांचे को मजबूत करने की दिशा में केंद्रित हैं।
इन परियोजनाओं के लिए 803 मिलियन नेपाली रुपये की सहायता इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसका असर बड़े शहरों तक सीमित रहने के बजाय स्थानीय समुदायों तक पहुंचने की संभावना है।
मदद नहीं, साझेदारी के नजरिए से देखना जरूरी
भारत-नेपाल संबंधों को केवल ‘एक देश दूसरे देश की मदद कर रहा है’ के नजरिए से देखना इस रिश्ते की व्यापकता को सीमित कर देगा।
भारत की आधिकारिक विकास नीति भी साझेदार देश की प्राथमिकताओं, स्थानीय क्षमता निर्माण और स्थानीय अवसरों को महत्व देने की बात करती है। भारत नेपाल में शिक्षा, स्वास्थ्य, ग्रामीण बुनियादी ढांचे, आजीविका और कनेक्टिविटी सहित विभिन्न क्षेत्रों में लंबे समय से विकास सहयोग करता आया है।
इसलिए इसे विकास साझेदारी के रूप में समझना अधिक उचित है—एक ऐसी साझेदारी जिसमें पड़ोसी देश की समृद्धि को पूरे क्षेत्र की स्थिरता और विकास से जोड़कर देखा जाता है।
रोटी-बेटी से रेल और विकास तक
भारत और नेपाल के रिश्ते की खूबसूरती शायद इसी में है कि इसमें कई परतें एक साथ मौजूद हैं।
एक परत इतिहास की है।
एक संस्कृति की।
एक धर्म और आस्था की।
एक व्यापार और अर्थव्यवस्था की।
और सबसे मजबूत परत आम लोगों के रिश्तों की है।
कहीं भारतीय परिवार की बेटी नेपाल में ब्याही है, तो कहीं नेपाल की बेटी का मायका भारत में है। कहीं बाजार एक-दूसरे पर निर्भर हैं, तो कहीं पर्व और धार्मिक यात्राएं लोगों को सीमा पार ले जाती हैं।
और अब इसी पुराने रिश्ते के साथ सड़क, रेलवे, अस्पताल, विद्यालय, कृषि केंद्र, डिजिटल स्वास्थ्य और दूसरी विकास परियोजनाएं नई कड़ियां जोड़ रही हैं।
सरहदें अपनी जगह, रिश्ते अपनी जगह
भारत और नेपाल के बीच समय-समय पर मतभेद भी रहे हैं और दो स्वतंत्र पड़ोसी देशों के बीच अलग-अलग राष्ट्रीय हित तथा दृष्टिकोण होना स्वाभाविक है। लेकिन दोनों देशों के रिश्ते की सबसे बड़ी ताकत यह है कि इसके नीचे लोगों के बीच सदियों पुराना सामाजिक और सांस्कृतिक आधार मौजूद है।
सरकारें बदल सकती हैं। नीतियां बदल सकती हैं। कूटनीतिक परिस्थितियां भी बदलती रहती हैं।
लेकिन जनकपुर और अयोध्या की सांस्कृतिक स्मृति, सीमा के बाजारों की आवाजाही, परिवारों के वैवाहिक संबंध और साझा पर्व-परंपराएं इस रिश्ते को एक अलग गहराई देती हैं।
श्यामल प्रतीक की कलम से
“भारत और नेपाल को केवल दो पड़ोसी देशों के रूप में देखना इस रिश्ते को बहुत छोटे दायरे में देखना होगा। यह वह संबंध है जिसमें सरहद है, लेकिन समाज के बीच दूरी नहीं; दो राष्ट्र हैं, लेकिन इतिहास और संस्कृति की अनेक धाराएं साझा हैं। ‘रोटी-बेटी’ का रिश्ता इसकी सबसे जीवंत पहचान है। भारत द्वारा नेपाल में अस्पताल, विद्यालय, सड़क, रेल, कृषि और पुनर्निर्माण से जुड़ी परियोजनाओं में सहयोग इसी पुराने रिश्ते को आधुनिक विकास साझेदारी से जोड़ता है। 803 मिलियन नेपाली रुपये की आठ नई परियोजनाएं इसलिए केवल विकास की खबर नहीं हैं—ये उस लंबे सफर की अगली कड़ी हैं, जिसमें भारत और नेपाल पड़ोसी होने से कहीं आगे बढ़कर एक-दूसरे के समाज से जुड़े हुए हैं।”
— श्यामल प्रतीक
रक्सौल अनुमंडल रिपोर्टर | चाणक्य न्यूज़ इंडिया
