नालसा की जागृति योजना के तहत मोतिहारी में कार्यशाला; विधिक सहायता, पुलिस और अभियोजन के बेहतर समन्वय की जरूरत बताई गई
श्यामल प्रतीक | रक्सौल अनुमंडल रिपोर्टर
चाणक्य न्यूज़ इंडिया
मोतिहारी, 09 अक्टूबर 2026। मानव तस्करी से प्रभावित व्यक्तियों को समय पर सहायता, सुरक्षा और न्याय उपलब्ध कराने के लिए संवेदनशील व्यवहार तथा विभिन्न संस्थाओं के समन्वय पर जोर दिया गया। जिला विधिक सेवा प्राधिकार, पूर्वी चंपारण की ओर से शुक्रवार को प्राधिकार के सभाकक्ष में आयोजित कार्यशाला में पीड़ितों की देखभाल और उनकी मानसिक स्थिति को ध्यान में रखकर सहायता देने के तरीकों पर चर्चा हुई।
राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (नालसा) की जागृति योजना के अंतर्गत आयोजित इस कार्यशाला का विषय “यौन मानव तस्करी से मुकाबला करने में सर्वाइवर की देखभाल एवं आघात-संवेदनशील दृष्टिकोण” था। इसमें पैनल अधिवक्ता, पैरा लीगल वॉलंटियर्स, पॉक्सो मामलों के विशेष लोक अभियोजक और एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट के पुलिस पदाधिकारी शामिल हुए।
कार्यक्रम का उद्घाटन प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश तथा जिला विधिक सेवा प्राधिकार के अध्यक्ष अभिषेक कुमार दास ने किया। उन्होंने कहा कि मानव तस्करी के पीड़ितों को समय पर सहायता उपलब्ध कराना और उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करना जरूरी है। संकट के शुरुआती समय, यानी ‘गोल्डन ऑवर’, में त्वरित एवं उचित कार्रवाई के महत्व को रेखांकित करते हुए उन्होंने बताया कि इससे संरक्षण, पुनर्वास और न्याय तक पहुंच की प्रक्रिया को मदद मिलती है। उन्होंने प्रतिभागियों से पीड़ितों के प्रति मानवीय, संवेदनशील और उत्तरदायित्वपूर्ण व्यवहार अपनाने का आह्वान किया।
प्राधिकार के सचिव नितिन त्रिपाठी ने कहा कि प्रशिक्षण से विधिक सहायता तंत्र की कार्यक्षमता बढ़ती है। जागरूक और प्रशिक्षित अधिवक्ता, स्वयंसेवक, अभियोजक तथा पुलिस पदाधिकारी पीड़ितों को उचित कानूनी सहायता और संरक्षण उपलब्ध कराने में प्रभावी भूमिका निभा सकते हैं।
उन्होंने पूर्वी चंपारण के सीमावर्ती क्षेत्र होने का उल्लेख करते हुए कहा कि मानव तस्करी की चुनौती से निपटने के लिए विभागों और संस्थाओं के बीच बेहतर समन्वय, सतर्कता तथा प्रभावी कार्रवाई आवश्यक है। कार्यशाला में इसी समन्वय को मजबूत करने और पीड़ित-केंद्रित सहायता को बढ़ावा देने पर चर्चा हुई।
संसाधन व्यक्तियों अधिवक्ता संजू सिंह, संभव गुप्ता और ताराकांत ऋषि ने मानव तस्करी से प्रभावित व्यक्तियों की पहचान, विधिक संरक्षण और संबंधित नियमों के व्यावहारिक पहलुओं पर जानकारी दी। उन्होंने समझाया कि पीड़ितों से बातचीत करते समय उनकी गरिमा, निजता, सुरक्षा और मानसिक स्थिति का ध्यान रखना चाहिए। सहायता और न्यायिक प्रक्रिया के दौरान उन्हें दोबारा मानसिक आघात से बचाना भी संवेदनशील व्यवहार का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
कार्यक्रम के आयोजन में डंकन अस्पताल और न्याय नेटवर्क परियोजना का सहयोग रहा।
