भारत की रूसी तेल खरीद पर लगाया था अतिरिक्त शुल्क, अब रूसी डीजल के आयात को अनुमति; ऊर्जा सुरक्षा पर अलग-अलग पैमाने से उठे सवाल
विशेष रिपोर्ट एवं विश्लेषण | श्यामल प्रतीक
नई दिल्ली/वाशिंगटन, 10 अक्टूबर 2026। रूस से तेल खरीदने पर भारत पर आर्थिक दबाव बनाने वाला अमेरिका अब अपने बाजार के लिए रूसी डीजल के आयात को अनुमति दे रहा है। महंगे ईंधन और घटते भंडार के बीच लिया गया यह फैसला अमेरिकी नीति पर बड़ा सवाल खड़ा करता है। जब अमेरिका अपनी जरूरत के लिए रूस से ईंधन खरीदने का रास्ता खोल सकता है, तो भारत की जरूरत पर आपत्ति क्यों उठाई गई थी?
अमेरिका ने 6 अगस्त 2025 को भारत की रूसी तेल खरीद को आधार बनाकर भारतीय सामानों पर कुछ अपवादों के साथ 25 प्रतिशत अतिरिक्त आयात शुल्क लगाने का आदेश दिया था। यह शुल्क 27 अगस्त से लागू हुआ। इस तरह भारत की तेल खरीद को उसके दूसरे व्यापार से जोड़कर दबाव बनाया गया। इससे स्पष्ट था कि अमेरिका भारत के ऊर्जा संबंधी फैसलों को अपनी नीति के अनुसार बदलवाना चाहता था।
भारत ने उस समय साफ कहा था कि उसकी तेल खरीद देश के लोगों को भरोसेमंद और किफायती ऊर्जा उपलब्ध कराने के लिए है। भारतीय सरकार ने अमेरिकी कार्रवाई को अनुचित और अन्यायपूर्ण बताते हुए राष्ट्रीय हितों की रक्षा की बात कही थी। देश में खेती, परिवहन, उद्योग और आम परिवारों के खर्च से जुड़े इस सवाल को केवल विदेशी दबाव के आधार पर नहीं देखा जा सकता।
भारत पर लगाया गया यह अतिरिक्त 25 प्रतिशत शुल्क अब लागू नहीं है। इसे 7 फरवरी 2026 से हटा दिया गया था। शुल्क हटाते समय अमेरिकी प्रशासन ने दावा किया था कि भारत रूसी तेल खरीद रोकने और अमेरिकी ऊर्जा उत्पाद लेने के लिए प्रतिबद्ध हुआ है। यह दावा अमेरिकी प्रशासन का था। फरवरी के आदेश में भारतीय खरीद की निगरानी का प्रावधान भी था।
अब अमेरिकी वित्त विभाग ने 9 अक्टूबर 2026 को रूसी डीजल से जुड़े निर्धारित सौदों और अमेरिका में उसके आयात को अस्थायी अनुमति दी है। यह छूट 7 अप्रैल 2027 तक के लिए है। इसका दायरा केवल अमेरिकी आयात तक सीमित नहीं है, लेकिन इससे सभी रूसी तेल उत्पादों पर लगी पाबंदियां समाप्त नहीं हुई हैं।
अमेरिकी बाजार में ईंधन की परेशानी गंभीर है। 10 अक्टूबर को वहां डीजल का राष्ट्रीय औसत खुदरा मूल्य लगभग 6.28 डॉलर प्रति गैलन था। अक्टूबर की सरकारी ऊर्जा रिपोर्ट के अनुसार, सितंबर में पूर्वी तट पर डीजल और हीटिंग ऑयल जैसे ईंधनों के भंडार पिछले पांच वर्षों के मौसमी औसत से 32 प्रतिशत नीचे थे।
हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि अमेरिका का पूरा तेल समाप्त हो गया है। सरकारी अनुमान के अनुसार, 2026 में उसका औसत कच्चा तेल उत्पादन करीब 1.39 करोड़ बैरल प्रतिदिन रह सकता है। असली परेशानी महंगे ईंधन, घटते क्षेत्रीय भंडार और आपूर्ति के दबाव की है।
अमेरिकी जनता को महंगे ईंधन से राहत देना उचित है। लेकिन यही अधिकार भारत की जनता को भी है। भारत सस्ता और भरोसेमंद तेल खरीदे तो उस पर दबाव बनाया जाए, जबकि अमेरिका अपनी जरूरत के लिए रूसी डीजल को अनुमति दे, तो दोहरे मानदंड का सवाल उठना स्वाभाविक है। राष्ट्रीय हित की रक्षा का अधिकार केवल अमेरिका को नहीं है।
कच्चा तेल और तैयार डीजल अलग उत्पाद हैं तथा उनके व्यापार के नियम भी अलग हो सकते हैं। फिर भी मूल प्रश्न बना रहता है: यदि रूस की ऊर्जा बिक्री से होने वाली आय पर आपत्ति थी, तो अब रूसी डीजल की खरीद को अनुमति देने का फैसला उस तर्क से कैसे मेल खाता है?
सबसे बड़ा सवाल स्वयं अमेरिका से है—जब वह अपनी ऊर्जा जरूरत के लिए रूस से डीजल आयात की अनुमति दे सकता है, तो भारत और दूसरे देशों की ऊर्जा जरूरत को आर्थिक दंड का आधार क्यों बनाया गया था? अपने लिए राहत का रास्ता स्वीकार करने वाला अमेरिका दूसरों की जरूरतों को भी उसी नजर से क्यों नहीं देखता?
भारत किस देश से ऊर्जा खरीदे, यह उसके राष्ट्रीय हितों और बाजार की जरूरतों से जुड़ा फैसला है। उसे बदलवाने के लिए व्यापार पर आर्थिक दंड लगाना बराबरी की साझेदारी पर सवाल उठाता है। एक शक्तिशाली देश दूसरे देश की जरूरतों की अनदेखी कर अपनी नीति थोपने लगे, तो उसमें हुक्म चलाने का रवैया दिखाई देता है। अमेरिकी नीति की तानाशाही प्रवृत्ति की आलोचना का आधार यही दबाव है।
भारतीय कंपनियों पर ताजा कार्रवाई का तथ्य भी स्पष्ट है। 8 अक्टूबर 2026 को मुंबई की समुद्र मरीन सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड और एसएसपीएल सॉल्यूशंस प्राइवेट लिमिटेड तथा पांच भारतीय नागरिकों को अमेरिकी प्रतिबंध सूची में शामिल किया गया। यह कार्रवाई ईरान संबंधी प्रतिबंधों के तहत हुई है। इसे रूस से तेल खरीदने पर हुई कार्रवाई बताना सही नहीं होगा।
रूसी डीजल की छूट अमेरिकी बाजार को राहत दे सकती है, लेकिन यह भारत पर पहले डाले गए दबाव का औचित्य भी कटघरे में खड़ा करती है। ऊर्जा सुरक्षा हर देश की जरूरत है। भारत की जरूरतों और स्वतंत्र फैसलों का सम्मान किए बिना अमेरिका की समान साझेदारी की बात अधूरी रहेगी।
