नेपाल की त्रिशूली घाटी में बाढ़ ने मचाई तबाही; पुल और तीन मंजिला स्कूल भवन बहा, लेकिन चंद मिनट पहले लिया गया फैसला बना बच्चों की जिंदगी की ढाल
विशेष रिपोर्ट | श्यामल प्रतीक
नुवाकोट, नेपाल।
नेपाल के नुवाकोट जिले की त्रिशूली घाटी में बुधवार की सुबह हालात अचानक भयावह हो गए। नदी और आसपास के जलस्रोतों में बढ़े पानी ने देखते ही देखते विनाशकारी सैलाब का रूप ले लिया। तेज बहाव अपने रास्ते में आने वाली संरचनाओं को नुकसान पहुंचाते हुए आगे बढ़ रहा था और इसी खतरे की जद में त्रिभुवन माध्यमिक विद्यालय भी था।
सुबह का वक्त था। स्कूल में बच्चे पहुंच रहे थे, हॉस्टल में बड़ी संख्या में छात्र मौजूद थे और प्रार्थना की तैयारी चल रही थी। शायद किसी को अंदाजा भी नहीं था कि कुछ ही समय बाद पूरा इलाका बाढ़ की चपेट में आने वाला है।
इसी बीच बेत्रावती से आया एक फोन कॉल इस कहानी का निर्णायक मोड़ बन गया।
प्रधानाध्यापक राजेंद्र दवाडी के एक दोस्त ने फोन कर उन्हें तेजी से बढ़ रहे खतरे की चेतावनी दी। सूचना मिलते ही दवाडी ने इंतजार नहीं किया। उन्होंने तुरंत आपातकालीन घंटी बजवाई और स्कूल तथा हॉस्टल में मौजूद बच्चों और कर्मचारियों को पीछे की ओर स्थित ऊंची पहाड़ियों पर पहुंचाने का आदेश दिया।
करीब 900 बच्चों और स्टाफ को स्कूल परिसर से सुरक्षित ऊंचाई की ओर भेजा गया। इसी दौरान स्कूल की ओर आ रहे 700 से अधिक बच्चों तक भी संदेश पहुंचाया गया और उनकी गाड़ियों को रास्ते में ही सुरक्षित स्थानों पर रुकवा दिया गया।
और फिर वही हुआ, जिसका डर था…
बच्चों को हटाए जाने के कुछ ही समय बाद बाढ़ का प्रचंड बहाव स्कूल के आसपास पहुंच गया। पानी की ताकत इतनी अधिक थी कि पुल इसकी चपेट में आ गया और स्कूल की तीन मंजिला इमारत भी जमींदोज हो गई।
कुछ देर पहले तक जिस परिसर में सैकड़ों बच्चों की चहल-पहल थी, वहां बाढ़ तबाही मचा चुकी थी।
इस घटना का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यही है—खतरा स्कूल तक पहुंचने से पहले प्रधानाध्यापक ने निर्णय ले लिया था। यदि बच्चों को निकालने में देर होती, तो इस प्राकृतिक आपदा का परिणाम कहीं अधिक भयावह हो सकता था।
बच्चों को बचाया, खुद पहाड़ी पर फंस गए
बचाव के दौरान प्रधानाध्यापक, स्कूल के कर्मचारी और करीब 40 से 50 बच्चे ऊंची पहाड़ी पर फंस गए। बिजली, भोजन और मोबाइल नेटवर्क जैसी सुविधाओं के बिना उन्हें कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। बाद में नेपाली सेना ने हेलिकॉप्टर के जरिए उन्हें सुरक्षित निकाला।
प्रधानाध्यापक राजेंद्र दवाडी और शिक्षक प्रदीप पंडित का त्वरित निर्णय इस पूरी घटना में निर्णायक साबित हुआ।
एक फोन… एक घंटी… और मौत के रास्ते से हट गए 1643 बच्चे
प्राकृतिक आपदाएं अक्सर संभलने का मौका नहीं देतीं। त्रिशूली घाटी में भी खतरा तेजी से बढ़ रहा था। लेकिन चेतावनी मिलते ही एक प्रधानाध्यापक ने उसे गंभीरता से लिया, आपातकालीन घंटी बजाई और बच्चों को सुरक्षित स्थान की ओर भेज दिया।
कुछ ही देर बाद स्कूल तबाह हो गया—लेकिन उसके बच्चे बच चुके थे।
नेपाल की इस बाढ़ के बीच यह कहानी केवल एक साहसी हेडमास्टर की नहीं, बल्कि समय पर मिली चेतावनी, त्वरित निर्णय और आपदा के समय सही नेतृत्व की ताकत की भी कहानी है।
उस सुबह स्कूल की घंटी पढ़ाई शुरू करने के लिए नहीं बजी थी… वह 1643 जिंदगियां बचाने की घंटी थी।
