खालूबार का वह गोरखा शेर, जो घायल होकर भी अपने जवानों को आगे बढ़ाता रहा—हवलदार भीम बहादुर दीवान

नेपाल के इलाम में जन्म, भारतीय सेना को समर्पित जीवन; कैप्टन मनोज पांडेय के साथ खालूबार की निर्णायक लड़ाई में दिखाई ऐसी वीरता कि मरणोपरांत मिला वीर चक्र

कारगिल: श्यामल प्रतीक की नज़र से
विशेष रिपोर्ट | श्यामल प्रतीक

कारगिल युद्ध की कहानी केवल बड़ी चोटियों और प्रसिद्ध नामों की कहानी नहीं है।

उस बर्फीली रणभूमि के इतिहास में कुछ ऐसे गोरखा योद्धाओं के नाम भी दर्ज हैं, जिन्होंने हजारों फीट की ऊँचाई पर मौत को सामने देखकर भी कदम पीछे नहीं खींचे।

खालूबार की लड़ाई में परमवीर चक्र विजेता कैप्टन मनोज कुमार पांडेय के साथ ऐसे ही एक योद्धा आगे बढ़ रहे थे—

हवलदार भीम बहादुर दीवान, वीर चक्र।

नेपाल के इलाम की धरती पर जन्मा यह गोरखा सैनिक 3 जुलाई 1999 को भारत की रक्षा करते हुए खालूबार की पहाड़ियों में हमेशा के लिए अमर हो गया।

उनकी कहानी भारत और नेपाल के बीच केवल भौगोलिक निकटता की कहानी नहीं है।

यह उस साझा सैन्य परंपरा और बलिदान की कहानी है, जिसमें नेपाल की धरती पर जन्मे एक बेटे ने भारतीय सेना की वर्दी पहनकर अपना सर्वोच्च बलिदान दिया।

इलाम से भारतीय सेना तक

हवलदार भीम बहादुर दीवान का जन्म 5 जून 1961 को नेपाल के इलाम जिले में हुआ था।

उपलब्ध जीवनी संबंधी विवरण के अनुसार, उन्होंने 18 वर्ष की आयु में 5 जून 1979 को भारतीय सेना जॉइन की और 1/11 गोरखा राइफल्स का हिस्सा बने।

1999 तक उन्हें सेना में करीब दो दशक हो चुके थे।

अब वे केवल एक जवान नहीं थे।

वे हवलदार और सेक्शन कमांडर थे—यानी युद्ध के मैदान में अपने साथियों को आगे लेकर चलने की जिम्मेदारी उनके कंधों पर थी।

और फिर आया कारगिल।

खालूबार—जहाँ हर कदम मौत को चुनौती था

कारगिल युद्ध के बटालिक सेक्टर में खालूबार रिज सामरिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण था।

ऊँचाई, दुर्गम पहाड़ी रास्ते और ऊपर मजबूत स्थिति में मौजूद विरोधी सैनिकों के कारण इस क्षेत्र को वापस लेना भारतीय सेना के लिए बेहद कठिन चुनौती थी।

1/11 गोरखा राइफल्स को खालूबार क्षेत्र में आगे बढ़ने की जिम्मेदारी मिली।

इसी बटालियन की ‘बी’ कंपनी में कैप्टन मनोज कुमार पांडेय थे।

और उनके नेतृत्व वाली टुकड़ी में अग्रणी सेक्शन कमांडर थे—

हवलदार भीम बहादुर दीवान।

2 और 3 जुलाई 1999 की रात भारतीय गोरखा सैनिक आगे बढ़ रहे थे।

रास्ता आसान नहीं था।

सरकारी वीर चक्र प्रशस्ति के अनुसार, लगभग सात घंटे की बेहद थकाऊ चढ़ाई के बाद जब सैनिक अपने लक्ष्य तक पहुँचे, तो चारों ओर की ऊँची स्थितियों से उन पर भारी फायर आया।

सामने छह मजबूत दुश्मन मोर्चे थे।

और उनमें दाईं ओर के दो मोर्चों को निष्क्रिय करने की जिम्मेदारी भीम बहादुर दीवान के सेक्शन को मिली।

अब पीछे लौटने का सवाल नहीं था।

आगे थे मनोज… साथ था भीम बहादुर का गोरखा सेक्शन

कैप्टन मनोज पांडेय के नेतृत्व में कार्रवाई आगे बढ़ी।

हवलदार भीम बहादुर दीवान ने अपने सेक्शन का नेतृत्व करते हुए पहले निर्धारित मोर्चे पर धावा बोला और उसे अपने नियंत्रण में लिया।

इसके बाद अगला लक्ष्य सामने था।

लड़ाई लंबी चली।

सरकारी प्रशस्ति के मुताबिक दूसरे मोर्चे के लिए संघर्ष एक घंटे से अधिक समय तक चला।

इस कार्रवाई के दौरान भीम बहादुर घायल हो गए।

लेकिन उनकी कहानी को असाधारण बनाने वाला क्षण इसके बाद आया।

घायल होने के बावजूद उन्होंने अपने सेक्शन का हौसला टूटने नहीं दिया।

उन्होंने अपने साथियों को आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करना जारी रखा।

उनके लिए उस समय शायद अपनी चोट से ज्यादा महत्वपूर्ण था—

मिशन।

दूसरा मोर्चा भी भारतीय सैनिकों के नियंत्रण में आ गया।

लेकिन इस विजय की कीमत बहुत बड़ी थी।

हवलदार भीम बहादुर दीवान अपनी चोटों से नहीं बच सके।

3 जुलाई 1999 को नेपाल के इलाम का वह बेटा खालूबार की धरती पर भारत के लिए बलिदान हो गया।

एक तरफ मनोज पांडेय… दूसरी तरफ भीम बहादुर

खालूबार की कहानी को केवल कैप्टन मनोज पांडेय तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता।

उनके पीछे और उनके साथ ऐसे गोरखा सैनिक खड़े थे, जिन्होंने असंभव दिखाई देने वाले अभियान को संभव बनाया।

भीम बहादुर दीवान उन्हीं में से एक थे।

कैप्टन मनोज कुमार पांडेय को उनके असाधारण साहस के लिए मरणोपरांत परमवीर चक्र मिला।

और खालूबार में असाधारण वीरता दिखाने वाले हवलदार भीम बहादुर दीवान को मरणोपरांत वीर चक्र प्रदान किया गया।

भारत सरकार की आधिकारिक वीर चक्र प्रशस्ति उनके साहस को सर्वोच्च कोटि का बताते हुए दर्ज करती है कि गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद उन्होंने अपने सेक्शन को प्रेरित करना जारी रखा और युद्धभूमि में सर्वोच्च बलिदान दिया।

🇮🇳🤝🇳🇵 नेपाल में जन्मा बेटा, भारत की रक्षा में अमर

हवलदार भीम बहादुर दीवान की कहानी मेरे लिए केवल कारगिल युद्ध की एक सैन्य कहानी नहीं है।

यह भारत और नेपाल के सदियों पुराने रिश्ते की एक भावुक मिसाल भी है।

जन्मभूमि नेपाल थी।

कर्मभूमि भारतीय सेना बनी।

और जब देश की रक्षा का समय आया तो उन्होंने अपनी जिम्मेदारी से मुँह नहीं मोड़ा।

खालूबार की ऊँचाइयों पर उन्होंने अपने जीवन की अंतिम लड़ाई लड़ी।

उनकी कहानी हमें याद दिलाती है कि गोरखा सैनिक की पहचान केवल उसकी वर्दी से नहीं होती—

उसकी पहचान उसके साहस, अनुशासन, कर्तव्य और साथियों के लिए आखिरी क्षण तक खड़े रहने से होती है।

कल्पना कीजिए—

नेपाल के इलाम में कहीं एक परिवार ने अपने बेटे को भारतीय सेना की वर्दी में विदा किया होगा।

वर्ष गुजरते गए।

वह जवान हवलदार बना।

साथियों का नेतृत्व करने लगा।

और फिर 1999 में कारगिल से खबर आई कि उनका अपना अब वापस उसी रूप में घर नहीं लौटेगा।

लेकिन वह केवल एक परिवार का बेटा बनकर भी नहीं रहा था।

वह इतिहास का हिस्सा बन चुका था।

खालूबार की चोटी आज भी उनकी गवाही देती है

खालूबार की लड़ाई कई दिनों तक चली और अंततः 1/11 गोरखा राइफल्स के सैनिकों ने इस महत्वपूर्ण क्षेत्र पर नियंत्रण स्थापित किया।

लेकिन हर सैन्य विजय के पीछे कुछ ऐसे नाम होते हैं जिन्हें इतिहास के बड़े अध्यायों के बीच पर्याप्त जगह नहीं मिल पाती।

इसीलिए “कारगिल: श्यामल प्रतीक की नज़र से” श्रृंखला का उद्देश्य केवल उन वीरों को याद करना नहीं है जिन्हें पूरा देश पहले से जानता है।

हम उन सैनिकों तक भी जाना चाहते हैं—

जिनके गाँव छोटे थे,

जिनके नाम शायद हर पाठ्यपुस्तक में नहीं हैं,

लेकिन जिनका बलिदान भारत की विजय की नींव में हमेशा के लिए दर्ज है।

हवलदार भीम बहादुर दीवान उन्हीं अमर योद्धाओं में से एक हैं।

इलाम की पहाड़ियों से निकला एक गोरखा बेटा…

खालूबार की पहाड़ियों तक पहुँचा…

और वहाँ अपनी जिंदगी मातृभूमि की रक्षा के नाम कर गया।

खालूबार जब भी याद किया जाएगा, कैप्टन मनोज पांडेय के साथ आगे बढ़ने वाले उस गोरखा सेक्शन और उसके वीर कमांडर हवलदार भीम बहादुर दीवान का नाम भी सम्मान से लिया जाएगा।

सलाम उस वीर को।
सलाम गोरखा परंपरा को।
और सलाम उस साझा भारत–नेपाल विरासत को, जिसे ऐसे योद्धाओं के साहस और बलिदान ने अमर बनाया।

**हवलदार भीम बहादुर दीवान, वीर चक्र

1/11 गोरखा राइफल्स
बलिदान — 3 जुलाई 1999**

वे लौटकर नहीं आए…
लेकिन खालूबार पर लिखी उनकी वीरता की कहानी कभी मिटेगी नहीं।

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