त्रिशूली-3ए हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट में मलबे से बंद सुरंगों तक पहुंचने की चुनौती; डॉक्टर, पैरामेडिक्स और टनल रेस्क्यू विशेषज्ञों ने किया तकनीकी सर्वे
विशेष रिपोर्ट | श्यामल प्रतीक
काठमांडू/रसुवा। नेपाल में 26 अगस्त को आई विनाशकारी बाढ़ के बाद जिंदगी बचाने की जंग अब पहाड़ों के भीतर बनी हाइड्रोपावर सुरंगों तक पहुंच गई है। रसुवा, नुवाकोट और धादिंग में तबाही के बीच कई हाइड्रोपावर परियोजनाओं की सुरंगों में कामगारों के फंसे या लापता होने की आशंका है। ऐसे कठिन समय में नेपाल सरकार के अनुरोध पर भारत की 11 सदस्यीय विशेष तकनीकी रेस्क्यू टीम राहत एवं बचाव अभियान में सहयोग के लिए पहुंची है।
भारतीय टीम में डॉक्टर, पैरामेडिक्स और टनल रेस्क्यू से जुड़े विशेषज्ञ शामिल हैं। टीम ने बाढ़ प्रभावित हाइड्रोपावर सुरंगों का ऑन-साइट तकनीकी आकलन किया, ताकि अंदर फंसे लोगों तक सुरक्षित और जल्द पहुंचने की रणनीति तैयार की जा सके।
अपर त्रिशूली क्षेत्र से 88 भारतीय कामगार सुरक्षित
भारतीय दूतावास के मुताबिक, अपर त्रिशूली क्षेत्र की विभिन्न सुरंग परियोजनाओं से 88 भारतीय कामगारों को नेपाली सेना द्वारा सुरक्षित निकाला जा चुका है। इसके बावजूद प्रभावित परियोजनाओं में फंसे और लापता लोगों की तलाश बड़ी चुनौती बनी हुई है।
भारतीय विशेषज्ञों ने रसुवा के बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में पहुंचकर परिस्थितियों का जायजा लिया। टीम का प्रमुख उद्देश्य यह समझना है कि बाढ़ के बाद गाद, मलबे और पानी से प्रभावित सुरंगों में सुरक्षित तरीके से प्रवेश कर खोज एवं बचाव अभियान को किस प्रकार आगे बढ़ाया जा सकता है।
त्रिशूली-3ए पर 82 सदस्यीय संयुक्त नेपाली टीम का ऑपरेशन
रसुवा स्थित त्रिशूली-3ए हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट इस समय बड़े रेस्क्यू ऑपरेशन का केंद्र बना हुआ है। बाढ़ के कारण परियोजना की सुरंग का प्रवेश द्वार गाद और मलबे से अवरुद्ध हो गया।
नेपाल सेना, सशस्त्र प्रहरी बल और नेपाल पुलिस के 82 जवानों की संयुक्त टीम सुरंग के प्रवेश द्वार से मलबा हटाकर अंदर पहुंचने का प्रयास कर रही है। इसी अभियान को तकनीकी मजबूती देने के लिए भारतीय विशेषज्ञ टीम भी मौके पर पहुंची है।
हेलिकॉप्टर बने राहत अभियान की जीवनरेखा
बाढ़ ने रसुवा और नुवाकोट के कई इलाकों में सड़क संपर्क को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। दुर्गम पहाड़ी इलाकों तक सड़क मार्ग से पहुंचना मुश्किल होने के कारण राहत एवं बचाव अभियान में हेलिकॉप्टरों की महत्वपूर्ण भूमिका बनी हुई है।
त्रिशूली नदी बेसिन नेपाल का महत्वपूर्ण हाइड्रोपावर और बुनियादी ढांचा क्षेत्र है। नदी के आसपास कई परियोजनाएं संचालित हो रही थीं और बाढ़ आने के समय बड़ी संख्या में कामगार इन्हीं परियोजनाओं में मौजूद थे।
रिपोर्ट के अनुसार त्रिशूली-3ए अकेली प्रभावित परियोजना नहीं है, बल्कि क्षेत्र की करीब 10 हाइड्रोपावर परियोजनाएं बाढ़ से प्रभावित हुई हैं।
सुरंगों के बाहर अपनों का इंतजार
रेस्क्यू ऑपरेशन के समानांतर इस आपदा का एक बेहद मार्मिक दृश्य नुवाकोट के बिदुर में देखने को मिल रहा है। नेपाल सेना के रेस्क्यू ऑपरेशन मुख्यालय के आसपास लापता कामगारों के परिजन अपने प्रियजनों का नाम दर्ज करा रहे हैं और हेलिकॉप्टरों से लौटने वाले लोगों में अपनों को तलाश रहे हैं।
किसी का पति सुरंग में काम कर रहा था, किसी का बेटा और किसी के परिवार का दूसरा सदस्य। संचार व्यवस्था और सड़क संपर्क प्रभावित होने के कारण कई परिवारों के लिए इंतजार और अनिश्चितता लगातार बढ़ रही है।
भारत के साथ अन्य देशों से भी विशेष सहायता
नेपाल ने स्पष्ट किया है कि इस व्यापक आपदा से निपटने के लिए उसे केवल तत्काल राहत और बचाव में ही नहीं, बल्कि आने वाले पुनर्निर्माण चरण में भी अंतरराष्ट्रीय सहयोग की आवश्यकता होगी।
नेपाल ने विशेष रूप से सुरंगों को खोलने और उनमें खोज-बचाव अभियान संचालित करने जैसी तकनीकी क्षमताओं में विदेशी सहयोग मांगा है। भारत के अलावा अन्य मित्र देशों की ओर से भी राहत सामग्री तथा विशेष तकनीकी सहयोग उपलब्ध कराया जा रहा है।
मुश्किल घड़ी में भारत-नेपाल सहयोग की एक और तस्वीर
हिमालयी आपदा ने नेपाल के सामने असाधारण चुनौती खड़ी की है। पहाड़ टूटे हैं, सड़कें बह गई हैं और कई सुरंगें मलबे से अवरुद्ध हैं। लेकिन इसी तबाही के बीच भारत और नेपाल के बीच आपदा सहयोग की एक मजबूत तस्वीर भी सामने आई है।
नेपाल की सेना, सशस्त्र प्रहरी और पुलिस जहां जमीन पर लगातार अभियान चला रहे हैं, वहीं भारत से पहुंचे विशेषज्ञ अब तकनीकी स्तर पर इस मिशन को मजबूती दे रहे हैं।
सुरंगों के अंधेरे में फंसी जिंदगियों तक पहुंचने की यह लड़ाई केवल एक रेस्क्यू ऑपरेशन नहीं है—यह उस मानवीय रिश्ते की भी तस्वीर है, जिसमें संकट की घड़ी में भारत और नेपाल एक-दूसरे के साथ खड़े दिखाई देते हैं।
