नेपाल में 538 शव बरामद, कई लोग अब भी लापता; पूर्वी चंपारण के लालाछपरा निवासी बुधन साह की पत्नी, तीन बेटियां और एक नतनी के बहने की सूचना
विशेष कवर स्टोरी | श्यामल प्रतीक
चाणक्य न्यूज़ इंडिया | पूर्वी चंपारण, बिहार
आदापुर। सरहदें देशों की सीमाएं तय कर सकती हैं, लेकिन दर्द को नहीं बांट सकतीं। नेपाल में आए विनाशकारी जलप्रलय ने जहां सैकड़ों परिवारों को गहरे शोक में डाल दिया है, वहीं इस त्रासदी की पीड़ा भारत-नेपाल सीमा पार कर बिहार के पूर्वी चंपारण जिले के आदापुर तक पहुंच गई है।
आदापुर प्रखंड के लालाछपरा गांव निवासी बुधन साह के परिवार के पांच सदस्यों के नेपाल में आए तेज सैलाब में बह जाने की सूचना ने पूरे इलाके को झकझोर दिया है।
प्रारंभिक जानकारी के अनुसार, सैलाब की चपेट में बुधन साह की पत्नी, उनकी तीन बेटियां और एक नतनी आई हैं। घटना की जानकारी स्वयं बुधन साह ने फोन कर अपने भाई को दी। इसके बाद लालाछपरा में मातम और चिंता का माहौल है।
नेपाल पर टूटा प्रकृति का कहर
26 अगस्त को नेपाल के भोटेकोशी नदी क्षेत्र में आए भीषण फ्लैश फ्लड ने बड़े पैमाने पर जनहानि और तबाही मचाई है। नेपाल के विदेश मंत्रालय द्वारा 28 अगस्त को जारी आधिकारिक अपडेट के अनुसार दोपहर 3 बजे तक नदी क्षेत्रों से 538 शव बरामद किए जा चुके थे, जबकि स्थानीय लोगों और पर्यटकों सहित कई लोग अब भी लापता थे।
आपदा में घरों, सड़कों, पुलों, जलविद्युत परियोजनाओं और अन्य महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचों को भी व्यापक क्षति पहुंची है। नेपाल की सुरक्षा एवं आपदा प्रबंधन एजेंसियां, स्थानीय प्रशासन और स्वास्थ्य सेवाएं खोज, बचाव और राहत अभियान में जुटी हुई हैं।
लालाछपरा में एक फोन और बदल गया माहौल
नेपाल में आई आपदा की खबरें पहले तक लालाछपरा के लोगों के लिए पड़ोसी देश की त्रासदी थीं, लेकिन बुधन साह के फोन ने इस दर्द को गांव के अपने आंगन तक पहुंचा दिया।
पत्नी, तीन बेटियों और एक नतनी के सैलाब में बहने की सूचना मिलते ही परिजनों की चिंता बढ़ गई। पूरा गांव अब परिवार के सदस्यों के बारे में किसी सकारात्मक खबर का इंतजार कर रहा है।
फिलहाल पांचों सदस्यों की स्थिति के संबंध में विस्तृत आधिकारिक पुष्टि की प्रतीक्षा है। इसलिए इस कठिन घड़ी में उम्मीद अभी भी कायम है।
नेपाल रोया तो भारत की आंखें भी नम
भारत और नेपाल का रिश्ता केवल दो पड़ोसी देशों का संबंध नहीं है। खुली सीमा के दोनों ओर बसे लोगों के बीच परिवार, रिश्तेदारी, संस्कृति, आस्था और सामाजिक जीवन की गहरी साझेदारी है।
इसीलिए नेपाल में आई इस आपदा का दर्द भारत में भी महसूस किया जा रहा है। नेपाल में सैकड़ों घर अपने प्रियजनों को खोज रहे हैं तो भारत के लालाछपरा में भी एक परिवार अपनों की सलामती की खबर का इंतजार कर रहा है।
आज भोटेकोशी और त्रिशूली के किनारे पसरा दर्द लालाछपरा के आंगन तक पहुंच चुका है।
संकट की घड़ी में सरहद से बड़ा इंसानी रिश्ता
भारत और नेपाल ने इतिहास में अनेक कठिन परिस्थितियां देखी हैं। प्राकृतिक आपदाओं के समय भी दोनों देशों के लोगों के बीच मानवीय और पारिवारिक रिश्तों की गहराई सामने आती रही है।
आज आवश्यकता पीड़ित परिवारों के प्रति संवेदना, राहत और सहयोग की है। यह केवल नेपाल की त्रासदी नहीं, बल्कि उन तमाम परिवारों का साझा मानवीय दर्द है जिनके अपने इस आपदा की चपेट में आए हैं।
पहाड़ों से उतरा सैलाब भले ही नेपाल में तबाही लेकर आया हो, लेकिन उससे निकली पीड़ा किसी सीमा पर नहीं रुकी। नेपाल के घरों में उठती सिसकियां और भारत के लालाछपरा में अपनों के इंतजार में लगी निगाहें बता रही हैं कि आपदा के सामने सरहदें छोटी पड़ जाती हैं और इंसानियत का रिश्ता सबसे बड़ा हो जाता है।
विशेष कवर स्टोरी — श्यामल प्रतीक
चाणक्य न्यूज़ इंडिया | पूर्वी चंपारण, बिहार
