करीब ढाई दशक से खामोश वीरगंज चीनी कारखाने में फिर गूंज सकती हैं मशीनें, नई सरकारी पहल ने जगाई हजारों परिवारों और गन्ना किसानों की उम्मीद
पुरानी औद्योगिक विरासत को पुनर्जीवित कर रोजगार, कृषि और आत्मनिर्भरता को मजबूती देने की कोशिश; 15 दिनों में रिपोर्ट देगा सरकारी कार्यदल
विशेष रिपोर्ट | श्यामल प्रतीक
नेपाल
नेपाल में राजनीतिक बदलावों के बीच अब सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक रोजगार सृजन और अर्थव्यवस्था को गति देना है। इसी दिशा में वर्षों से बंद पड़े सरकारी उद्योगों को पुनर्जीवित करने की चर्चा के बीच ऐतिहासिक वीरगंज चीनी कारखाना एक बार फिर उम्मीद का केंद्र बन गया है।
करीब ढाई दशक से बंद पड़े इस विशाल औद्योगिक प्रतिष्ठान को पुनः संचालन में लाने की संभावनाओं का अध्ययन करने के लिए नेपाल सरकार के उद्योग, वाणिज्य तथा आपूर्ति मंत्रालय ने प्रक्रिया आगे बढ़ाई है। मंत्रिपरिषद के निर्णय के आधार पर गठित कार्यदल को कारखाने की मौजूदा स्थिति, मशीनरी, भवन, जमीन, कानूनी जटिलताओं और आर्थिक व्यवहार्यता का अध्ययन कर 15 दिनों के भीतर रिपोर्ट देने की जिम्मेदारी दी गई है।
यह पहल केवल एक पुरानी फैक्ट्री को दोबारा खोलने की कवायद नहीं मानी जा रही। यदि अध्ययन सकारात्मक रहा और सरकार व्यावहारिक एवं टिकाऊ मॉडल के साथ आगे बढ़ती है, तो इसका प्रभाव वीरगंज से लेकर पर्सा, बारा, रौतहट और पूरे मधेश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था तक दिखाई दे सकता है।
कभी नेपाल के औद्योगिक गौरव का प्रतीक था वीरगंज चीनी कारखाना
वीरगंज चीनी कारखाने का इतिहास नेपाल के शुरुआती औद्योगिकीकरण से जुड़ा है। तत्कालीन सोवियत संघ के आर्थिक एवं तकनीकी सहयोग से स्थापित यह कारखाना लंबे समय तक नेपाल के महत्वपूर्ण सरकारी उद्योगों में गिना जाता था।
अपने बेहतर दौर में इस कारखाने ने बड़ी मात्रा में गन्ने की खरीद और चीनी का उत्पादन किया। उपलब्ध ऐतिहासिक आंकड़ों के अनुसार आर्थिक वर्ष 2047/48 विक्रम संवत में यहां 2,02,750 क्विंटल चीनी का उत्पादन हुआ था और किसानों से करीब 23,09,548 क्विंटल गन्ना खरीदा गया था।
इसका महत्व केवल चीनी उत्पादन तक सीमित नहीं था। इसके साथ किसान, मजदूर, परिवहन व्यवसायी, छोटे व्यापारी और आसपास के बाजारों की पूरी आर्थिक श्रृंखला जुड़ी हुई थी।
लेकिन समय के साथ उत्पादन में गिरावट, प्रबंधन संबंधी समस्याएं, गन्ने की उपलब्धता में कमी और किसानों को भुगतान सहित कई चुनौतियों ने कारखाने को कमजोर किया। अंततः कारखाना बंद हो गया और कभी आर्थिक गतिविधियों से गुलजार रहने वाला विशाल परिसर वर्षों तक खामोश पड़ा रहा।
अब खामोश मशीनों की स्थिति जांच रही सरकार
सरकार द्वारा गठित कार्यदल केवल कागजी अध्ययन नहीं करेगा। उसे यह देखना है कि कारखाने के भवनों और मौजूदा मशीनों की वास्तविक स्थिति क्या है तथा पुराने संसाधनों का कितना हिस्सा आज भी इस्तेमाल किया जा सकता है।
कार्यदल यह भी आकलन करेगा कि पुराने संयंत्र की मरम्मत कर उत्पादन शुरू करना व्यावहारिक होगा या आधुनिक तकनीक और नए बुनियादी ढांचे की आवश्यकता पड़ेगी।
इसके साथ कारखाने की जमीन एवं दूसरी संपत्तियों की वर्तमान स्थिति, उनसे जुड़े कानूनी तथा प्रशासनिक प्रश्नों का भी अध्ययन किया जाना है। यानी सरकार के सामने सवाल केवल “कारखाना खोला जाए या नहीं” का नहीं है, बल्कि “यदि खोला जाए तो उसे आर्थिक रूप से टिकाऊ कैसे बनाया जाए” का भी है।
रोजगार के मोर्चे पर बन सकता है बड़ा अवसर
नेपाल के लिए इस परियोजना का सबसे महत्वपूर्ण पहलू रोजगार हो सकता है।
कारखाना पुनः शुरू होने की स्थिति में प्रत्यक्ष रोजगार के साथ-साथ गन्ना खेती, कटाई, ढुलाई, मशीनों की मरम्मत, पैकेजिंग, गोदाम, परिवहन, स्थानीय व्यापार और दूसरी सहायक गतिविधियों में रोजगार के अवसर पैदा हो सकते हैं।
जून 2026 में नेपाल की राष्ट्रीय सभा में सांसद उर्मिला अर्याल ने वीरगंज चीनी कारखाने को आधुनिक बहुउद्देश्यीय उद्योग के रूप में विकसित करने का प्रस्ताव रखते हुए दावा किया था कि बड़े पैमाने पर आधुनिकीकरण होने पर इससे करीब 35 हजार लोगों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार मिल सकता है। हालांकि यह संख्या अभी वास्तविक रोजगार की सरकारी गारंटी नहीं, बल्कि प्रस्तावित मॉडल से जुड़ा अनुमान है।
यही कारण है कि कारखाने के पुनर्जीवन को केवल औद्योगिक परियोजना नहीं, बल्कि रोजगार आधारित क्षेत्रीय आर्थिक पुनरुत्थान की संभावना के रूप में देखा जा सकता है।
सबसे बड़ी उम्मीद गन्ना किसानों को
कारखाने के दोबारा चलने की चर्चा से पर्सा, बारा और रौतहट सहित मधेश के गन्ना किसानों में उत्साह देखा जा रहा है। किसानों के लिए पास में बड़ा खरीदार उपलब्ध होने का अर्थ है—गन्ने के लिए अपेक्षाकृत सुनिश्चित बाजार और लंबी दूरी तक फसल पहुंचाने की मजबूरी में संभावित कमी।
लेकिन पुराने अनुभव एक महत्वपूर्ण सबक भी देते हैं।
केवल कारखाना खोलना पर्याप्त नहीं होगा। किसानों के लिए उचित मूल्य, सही तौल, समय पर भुगतान और पारदर्शी खरीद व्यवस्था सुनिश्चित करनी होगी। यदि सरकार इन व्यवस्थाओं को मजबूत करती है, तभी किसान दोबारा बड़े पैमाने पर गन्ना उत्पादन की ओर आकर्षित हो सकते हैं।
चीनी आयात पर निर्भरता घटाने का अवसर
नेपाल के सामने चीनी की घरेलू मांग और उत्पादन के बीच अंतर भी एक चुनौती है।
राष्ट्रीय सभा में प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार नेपाल में चीनी की वार्षिक मांग लगभग 2.70 लाख मीट्रिक टन बताई गई, जबकि घरेलू उत्पादन करीब 1.20 लाख मीट्रिक टन होने का दावा किया गया। इस हिसाब से मांग का बड़ा हिस्सा आयात से पूरा करना पड़ता है।
यदि वीरगंज चीनी कारखाना आधुनिक क्षमता के साथ सफलतापूर्वक उत्पादन शुरू करता है तो घरेलू उत्पादन बढ़ाने में योगदान मिल सकता है। इससे विदेशी मुद्रा पर दबाव कम करने और चीनी आपूर्ति की घरेलू श्रृंखला को मजबूत करने में मदद मिल सकती है।
लेकिन इसका वास्तविक प्रभाव कारखाने की अंतिम उत्पादन क्षमता, गन्ने की उपलब्धता और संचालन मॉडल तय होने के बाद ही स्पष्ट होगा।
सिर्फ चीनी नहीं—बायोइथेनॉल, बिजली और जैविक खाद की भी संभावना
भविष्य का वीरगंज चीनी कारखाना केवल परंपरागत चीनी मिल तक सीमित रहे, यह जरूरी नहीं।
संसद में सामने रखे गए एक प्रस्ताव में इसे लगभग 5,000 TCD (टन गन्ना प्रतिदिन) क्षमता वाले बहुउद्देश्यीय औद्योगिक परिसर के रूप में विकसित करने की बात कही गई है। उसी प्रस्ताव में चीनी के साथ बायोइथेनॉल, बिजली और जैविक खाद जैसे सह-उत्पादों की संभावना भी बताई गई।
यदि भविष्य की व्यवहार्यता रिपोर्ट और निवेश मॉडल इस दिशा को व्यावहारिक पाते हैं, तो गन्ने का अधिक समग्र उपयोग संभव होगा और उद्योग की आय केवल चीनी बिक्री पर निर्भर नहीं रहेगी।
पुरानी गलती दोहराने से बचना होगा
इतिहास इस परियोजना को एक चेतावनी भी देता है।
पुरानी मशीनें, उत्पादन लागत, प्रबंधन, किसान भुगतान, कच्चे माल की पर्याप्त उपलब्धता और बाजार प्रतिस्पर्धा जैसे सवालों का समाधान किए बिना केवल सरकारी घोषणा के आधार पर इतने बड़े उद्योग को सफल नहीं बनाया जा सकता।
नेपाल सरकार की एक पुरानी उच्चस्तरीय समीक्षा ने भी मशीनरी, उत्पादन क्षमता और कच्चे माल की उपलब्धता को लेकर कारखाने को दोबारा चलाने में कठिनाइयों की ओर संकेत किया था। इसलिए मौजूदा अध्ययन का महत्व और बढ़ जाता है।
नई शुरुआत तभी सफल होगी जब पुराने अनुभवों से सीखकर आधुनिक तकनीक, पेशेवर प्रबंधन, वित्तीय अनुशासन और किसान-केंद्रित व्यवस्था तैयार की जाए।
वीरगंज के लिए उद्योग से कहीं बड़ी है यह कहानी
वीरगंज नेपाल का प्रमुख औद्योगिक और व्यापारिक केंद्र है। इसलिए इतने पुराने औद्योगिक प्रतिष्ठान का पुनर्जीवन शहर के लिए प्रतीकात्मक महत्व भी रखता है।
यदि कारखाना व्यावहारिक मॉडल पर दोबारा शुरू होता है तो इसका आर्थिक प्रभाव फैक्ट्री की चारदीवारी तक सीमित नहीं रहेगा। गन्ना लेकर आने वाले ट्रैक्टर से लेकर परिवहन, दुकान, गोदाम, कृषि उपकरण, स्थानीय सेवाओं और छोटे कारोबार तक आर्थिक गतिविधियों की एक पूरी श्रृंखला सक्रिय हो सकती है।
यानी एक मशीन चलने के साथ कई छोटे आर्थिक पहिए भी घूम सकते हैं।
नई सरकार के सामने परीक्षा—घोषणा से जमीन तक पहुंचे योजना
नेपाल में सरकार और राजनीतिक नेतृत्व में बदलावों के बीच जनता की सबसे बड़ी अपेक्षाओं में रोजगार, औद्योगिक विकास और आर्थिक अवसर शामिल हैं। ऐसे में बंद पड़े उद्योगों की उपयोगी परिसंपत्तियों को पुनर्जीवित करने की नीति महत्वपूर्ण साबित हो सकती है।
लेकिन वीरगंज चीनी कारखाने की असली परीक्षा अभी बाकी है।
15 दिनों की अध्ययन रिपोर्ट बताएगी कि दशकों से खड़ी पुरानी मशीनों में कितना जीवन बचा है, कितना नया निवेश चाहिए, कौन-सा संचालन मॉडल उपयुक्त होगा और कारखाना आर्थिक रूप से टिकाऊ बन सकता है या नहीं।
इसलिए फिलहाल इसे उपलब्धि से अधिक एक महत्वपूर्ण शुरुआत कहना उचित होगा।
खामोश चिमनी से उठे रोजगार का धुआं—यही सबसे बड़ी उम्मीद
करीब ढाई दशक पहले जिस कारखाने की मशीनें शांत हुई थीं, उसके आसपास एक पूरी पीढ़ी बदल चुकी है। अब सरकार की पहल ने उसी औद्योगिक परिसर को फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है।
यदि अध्ययन सकारात्मक आता है, निवेश सुनिश्चित होता है, आधुनिक तकनीक लगती है और किसानों को उचित मूल्य तथा समय पर भुगतान की मजबूत व्यवस्था बनती है, तो वीरगंज चीनी कारखाने का पुनर्जन्म केवल चीनी उत्पादन की कहानी नहीं होगा।
यह खेत से कारखाने तक रोजगार की नई श्रृंखला, मधेश के किसानों के लिए नया बाजार और नेपाल के लिए घरेलू उत्पादन बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बन सकता है।
अब निगाह उस सरकारी रिपोर्ट पर है जो तय करने में अहम भूमिका निभाएगी कि वीरगंज की वर्षों से खामोश पड़ी इस औद्योगिक विरासत की मशीनें वास्तव में फिर चलेंगी—या पुनर्जीवन का सपना एक बार फिर कागजों तक सीमित रह जाएगा।
