पशु चिकित्सा से कौशल विकास तक—सीमा की सुरक्षा के साथ ग्रामीणों की आजीविका, महिलाओं की आत्मनिर्भरता और नई पीढ़ी से जुड़ाव पर 71वीं वाहिनी का जोर; मूर्तियां टोला में निःशुल्क पशु चिकित्सा शिविर बनी जनसेवा की नई कड़ी
विशेष कवर स्टोरी | श्यामल प्रतीक
रक्सौल अनुमंडल संवाददाता | चाणक्य न्यूज़ इंडिया
मोतिहारी/आदापुर। सरहद की सुरक्षा केवल सीमा स्तंभों की निगरानी और अवैध गतिविधियों को रोकने तक सीमित नहीं होती। सीमा तब और मजबूत होती है, जब उसके आसपास बसे गांव सुरक्षित हों, ग्रामीणों में सुरक्षा बलों के प्रति विश्वास हो, महिलाओं और युवाओं को आत्मनिर्भर बनने के अवसर मिलें और सुरक्षा बल स्थानीय समाज के सुख-दुख में सहभागी बने।
भारत-नेपाल सीमा पर तैनात 71वीं वाहिनी सशस्त्र सीमा बल (SSB), मोतिहारी पिछले कुछ समय से इसी व्यापक सोच को जमीन पर उतारती दिखाई दे रही है। एक ओर सीमा पर तस्करी और अन्य अवैध गतिविधियों के खिलाफ सतर्कता और कार्रवाई जारी है, तो दूसरी ओर सीमावर्ती ग्रामीणों के लिए नागरिक कल्याण कार्यक्रमों के माध्यम से स्वास्थ्य, कौशल विकास, स्वरोजगार और सामाजिक जागरूकता की दिशा में भी पहल की जा रही है।
इसी अभियान की ताजा कड़ी 25 अगस्त को आदापुर क्षेत्र के मूर्तियां टोला गांव में देखने को मिली, जहां कमांडेंट प्रफुल्ल कुमार के दिशा-निर्देशन में ‘डी’ समवाय कोरैया के कार्यक्षेत्र में निःशुल्क पशु चिकित्सा शिविर आयोजित किया गया।
पशुधन की सेहत से ग्रामीण परिवार की अर्थव्यवस्था तक
सीमावर्ती गांवों में पशुधन केवल घर में पाले जाने वाले पशु नहीं, बल्कि अनेक परिवारों की आजीविका और ग्रामीण अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार हैं। किसी पशु के बीमार होने का सीधा असर पशुपालक परिवार की आय पर पड़ सकता है।
इसी जरूरत को ध्यान में रखते हुए आयोजित शिविर में डॉ. ओमप्रकाश प्रसाद (TVO), आदापुर ने ग्रामीणों के पशुओं की जांच और उपचार किया। जरूरतमंद पशुपालकों को पशुओं के लिए निःशुल्क दवाएं भी उपलब्ध कराई गईं।
डॉ. ओमप्रकाश प्रसाद ने ग्रामीणों को पशुओं के बेहतर रख-रखाव, स्वास्थ्य प्रबंधन और समय पर उपचार से संबंधित आवश्यक सलाह एवं दिशा-निर्देश भी दिए। इस तरह शिविर उपचार तक सीमित न रहकर पशुपालकों के लिए जागरूकता का माध्यम भी बना।
कभी पशुओं की सेहत, कभी महिलाओं के हाथों में हुनर
मूर्तियां टोला का पशु चिकित्सा शिविर 71वीं वाहिनी की जनकल्याणकारी गतिविधियों की अकेली तस्वीर नहीं है। हाल के समय में वाहिनी ने सीमावर्ती क्षेत्रों में कौशल विकास और रोजगारोन्मुखी प्रशिक्षण को भी महत्व दिया है।
इसका महत्वपूर्ण उदाहरण 9 जुलाई से 7 अगस्त 2026 तक पंचायत सरकार भवन, पिठवा (झरोखर) में महिलाओं और युवतियों के लिए आयोजित 30 दिवसीय निःशुल्क सिलाई प्रशिक्षण रहा। प्रशिक्षण पूरा करने वाली प्रतिभागियों को प्रमाण-पत्र प्रदान किए गए और उन्हें अपने कौशल को स्वरोजगार तथा आर्थिक आत्मनिर्भरता से जोड़ने के लिए प्रोत्साहित किया गया।
सिलाई-कढ़ाई जैसे प्रशिक्षण हों या महिलाओं और युवाओं के लिए अन्य कौशल विकास कार्यक्रम—इन पहलों का मूल उद्देश्य सीमावर्ती आबादी को केवल सहायता देना नहीं, बल्कि उन्हें ऐसा हुनर उपलब्ध कराना है जो भविष्य में आत्मनिर्भरता और सम्मानजनक आजीविका का आधार बन सके।
सुरक्षा की परिभाषा को सामाजिक सरोकार से जोड़ती 71वीं वाहिनी
71वीं वाहिनी की इन गतिविधियों को एक साथ देखने पर सीमा सुरक्षा की एक व्यापक तस्वीर सामने आती है। एक तरफ जवान सीमा पर निगरानी करते हैं, तस्करी और अवैध गतिविधियों के खिलाफ कार्रवाई करते हैं; दूसरी तरफ नागरिक कल्याण कार्यक्रमों के जरिए गांवों और नई पीढ़ी के बीच पहुंचते हैं।
स्वास्थ्य एवं पशु चिकित्सा शिविर, कौशल विकास, महिलाओं के लिए प्रशिक्षण और युवाओं व विद्यार्थियों से संवाद जैसी गतिविधियां सुरक्षा बल और सीमावर्ती समाज के बीच विश्वास की उस कड़ी को मजबूत करती हैं, जो किसी भी संवेदनशील सीमा क्षेत्र में बेहद महत्वपूर्ण होती है।
महिलाओं की आत्मनिर्भरता—जनकल्याण कार्यक्रमों का महत्वपूर्ण पक्ष
सीमावर्ती ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं और युवतियों को कौशल प्रशिक्षण से जोड़ने की पहल का महत्व केवल प्रशिक्षण पूरा होने तक नहीं है। सिलाई जैसे रोजगारोन्मुखी हुनर महिलाओं को अपने गांव और घर के आसपास रहते हुए आय के अवसर तलाशने में मदद कर सकते हैं।
जब किसी महिला के हाथ में हुनर आता है, तो उसका प्रभाव केवल एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता। उसका लाभ परिवार की आर्थिक स्थिति और अगली पीढ़ी तक पहुंच सकता है। इस दृष्टि से 71वीं वाहिनी के नागरिक कल्याण कार्यक्रम महिला सशक्तीकरण और ग्रामीण आत्मनिर्भरता की दिशा में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते दिखाई देते हैं।
वर्दी जब गांव तक पहुंचती है, विश्वास मजबूत होता है
सीमावर्ती क्षेत्र में सुरक्षा बल और स्थानीय नागरिकों के बीच मजबूत विश्वास सीमा प्रबंधन की महत्वपूर्ण ताकत है। ग्रामीण जब एसएसबी के जवानों को केवल सीमा चौकियों पर ही नहीं, बल्कि अपने गांव में चिकित्सा शिविर, प्रशिक्षण, जागरूकता और सामाजिक कार्यक्रमों के बीच देखते हैं, तो वर्दी और समाज के बीच संवाद का दायरा स्वाभाविक रूप से बढ़ता है।
यही कारण है कि ऐसे नागरिक कल्याण कार्यक्रमों का महत्व केवल उस दिन मिलने वाली सुविधा तक सीमित नहीं रहता। वे दीर्घकाल में सुरक्षा बल और सीमावर्ती नागरिकों के बीच भरोसे और सहभागिता को मजबूत करने का माध्यम बनते हैं।
भारत-नेपाल की खुली सीमा पर जनविश्वास भी सुरक्षा की बड़ी ताकत
भारत और नेपाल की खुली अंतरराष्ट्रीय सीमा दोनों देशों के सदियों पुराने सामाजिक, सांस्कृतिक और आत्मीय संबंधों की विशिष्ट पहचान है। सीमा के दोनों ओर बसे समुदायों के बीच पारिवारिक और सामाजिक रिश्ते इस क्षेत्र को विशेष बनाते हैं।
ऐसी खुली सीमा पर अवैध गतिविधियों को रोकने के लिए सुरक्षा बलों की सतर्कता जितनी आवश्यक है, उतना ही महत्वपूर्ण स्थानीय नागरिकों का सहयोग और विश्वास भी है।
इसी संदर्भ में 71वीं वाहिनी की कार्यशैली में “सुरक्षा के साथ सेवा” का पक्ष महत्वपूर्ण दिखाई देता है—जहां सीमा की चौकसी के साथ सीमावर्ती समाज को मजबूत बनाने की कोशिश भी साथ-साथ चलती है।
“इकहत्तर: सबसे बेहतर”—नारे से आगे जनसेवा की पहचान
“इकहत्तर: सबसे बेहतर” का संदेश तब और सार्थक दिखाई देता है, जब इसे धरातल पर होने वाली गतिविधियों से जोड़कर देखा जाए।
कहीं सीमा पर जवान मुस्तैदी से अवैध गतिविधियों पर नजर रखते हैं, कहीं ग्रामीणों के पशुओं के लिए चिकित्सा शिविर लगाया जाता है, तो कहीं महिलाओं और युवतियों को हुनर देकर आत्मनिर्भरता की राह दिखाने का प्रयास होता है।
25 अगस्त को मूर्तियां टोला में आयोजित पशु चिकित्सा शिविर इसी लंबी श्रृंखला की एक और कड़ी बना।
सरहद सुरक्षित हो और सरहद के गांव भी मजबूत हों
71वीं वाहिनी की इन पहलों का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यही है कि सीमा की वास्तविक मजबूती केवल चौकसी में नहीं, बल्कि उसके आसपास रहने वाले नागरिकों के विश्वास और सशक्तीकरण में भी निहित है।
सरहद पर तैनात जवान जब प्रहरी की भूमिका निभाने के साथ ग्रामीण समाज के सहयोगी बनते हैं, महिलाओं के हाथों में हुनर पहुंचता है और पशुपालक के दरवाजे तक चिकित्सा सुविधा आती है, तब सुरक्षा और सेवा का रिश्ता और व्यापक हो जाता है।
सरहद की चौकसी से गांव की खुशहाली तक—71वीं वाहिनी SSB की यही बहुआयामी भूमिका सीमावर्ती समाज में उसकी अलग पहचान बना रही है।
