कोख से बाजार तक? डेढ़ लाख में नवजात के कथित सौदे ने खड़े किए गंभीर सवाल

जन्म से पहले ही कथित तौर पर तय हो गई थी कीमत; सदर अस्पताल चौक के पास पुलिस की कार्रवाई में नवजात सुरक्षित, ₹1.50 लाख बरामद होने का दावा

मामला केवल एक बच्चे के सौदे का नहीं—जांच के घेरे में बिचौलियों की भूमिका और संभावित नेटवर्क

विशेष रिपोर्ट | श्यामल प्रतीक
मोतिहारी | पूर्वी चंपारण

एक नवजात, जिसने अभी दुनिया में आंखें भी ठीक से नहीं खोली थीं, कथित तौर पर उसके भविष्य का फैसला रुपये के सौदे में करने की तैयारी हो चुकी थी। मोतिहारी के सदर अस्पताल चौक के पास सामने आए मामले ने बाल संरक्षण व्यवस्था के सामने गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

पुलिस के प्रारंभिक दावे के मुताबिक, नवजात को करीब डेढ़ लाख रुपये में कथित रूप से बेचने की कोशिश की जा रही थी। गुप्त सूचना पर की गई कार्रवाई में पुलिस ने बच्चे को सुरक्षित करते हुए मामले से जुड़े कई लोगों को पकड़ा तथा ₹1.50 लाख बरामद किए जाने की बात कही है।

जन्म से पहले कथित सौदे की तैयारी

पुलिस जांच में सामने आई प्रारंभिक जानकारी के अनुसार, हरसिद्धि थाना क्षेत्र के पकड़िया टोला निवासी प्रमोद साहनी और इंदू देवी के पहले से छह बच्चे हैं। सोमवार को इंदू देवी ने सदर अस्पताल चौक की गली नंबर-1 स्थित एक निजी अस्पताल में बच्चे को जन्म दिया।

मामले का सबसे गंभीर पहलू पुलिस का यह दावा है कि बच्चे के जन्म से पहले ही उसकी कथित खरीद-बिक्री को लेकर बातचीत और तैयारी हो चुकी थी। यदि विस्तृत जांच में यह तथ्य प्रमाणित होता है, तो मामला अचानक लिया गया निर्णय न होकर पूर्व नियोजित सौदे की ओर संकेत कर सकता है।

₹1.50 लाख में सौदे का आरोप

प्रारंभिक जांच के मुताबिक, नवजात को घोड़ासहन थाना क्षेत्र के लेन बसवरिया निवासी चिंता देवी को देने की कथित योजना थी। पुलिस के अनुसार, बच्चा सौंपे जाने और बदले में करीब डेढ़ लाख रुपये के लेन-देन की सूचना मिलने के बाद कार्रवाई की गई।

पुलिस ने मौके से नवजात को सुरक्षित किया और कथित सौदे से संबंधित रकम बरामद करने का दावा किया है। मामले में पकड़े गए लोगों से पूछताछ के आधार पर घटनाक्रम की कड़ियां जोड़ने की कोशिश की जा रही है।

क्या किसी बिचौलिया नेटवर्क की भूमिका थी?

इस प्रकरण में सबसे महत्वपूर्ण जांच अब इस बात की है कि संबंधित लोग एक-दूसरे के संपर्क में कैसे आए। पुलिस के अनुसार, मामले में अन्य व्यक्तियों की भूमिका भी जांच के दायरे में है। आशा शोभा सिंह सहित जिन लोगों के नाम प्रारंभिक जांच में सामने आए हैं, उनकी वास्तविक भूमिका पुलिस जांच पूरी होने के बाद ही स्पष्ट होगी।

यही बिंदु इस मामले को एक कथित व्यक्तिगत सौदे से आगे ले जाता है। जांच एजेंसियों के सामने यह पता लगाना महत्वपूर्ण होगा कि क्या यह एक अकेली घटना थी या नवजात बच्चों की अवैध खरीद-बिक्री से जुड़े किसी बड़े तंत्र की कोई कड़ी।

अस्पताल और आसपास की कड़ियों की जांच भी अहम

यदि बच्चे के जन्म से पहले ही कथित सौदे की तैयारी हुई थी, तो संपर्क कब और किसके माध्यम से स्थापित हुआ—यह जांच का महत्वपूर्ण विषय बन जाता है। संबंधित निजी अस्पताल या उसके किसी कर्मचारी की भूमिका के संबंध में बिना पुलिस जांच के निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा, लेकिन घटनाक्रम से जुड़े संपर्कों और परिस्थितियों की निष्पक्ष जांच आवश्यक है।

नवजात कोई वस्तु नहीं—गोद लेने की होती है कानूनी प्रक्रिया

भारत में किसी बच्चे को पैसे लेकर निजी स्तर पर खरीदना या बेचना वैध गोद लेने की प्रक्रिया नहीं है। बच्चे को गोद लेने के लिए निर्धारित कानूनी और संस्थागत प्रक्रिया मौजूद है। इसलिए इस मामले में पुलिस जांच के साथ बाल संरक्षण से जुड़ी सक्षम संस्थाओं की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो जाती है, ताकि नवजात की सुरक्षा और उसके सर्वोत्तम हित को प्राथमिकता दी जा सके।

चार सवाल, जिनके जवाब जांच से आने बाकी

पहला— कथित सौदे की बातचीत कब और किसके माध्यम से शुरू हुई?

दूसरा— बच्चे को लेने वाली महिला और उसके माता-पिता के बीच संपर्क किसने कराया?

तीसरा— क्या किसी बिचौलिये या संगठित नेटवर्क की भूमिका थी?

चौथा— क्या इससे पहले भी इसी तरह के किसी कथित सौदे से जुड़े लोग इस नेटवर्क के संपर्क में रहे हैं?

इन सवालों के उत्तर पुलिस की विस्तृत जांच और उपलब्ध साक्ष्यों से ही सामने आने चाहिए।

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