भारत-नेपाल सीमा पर स्थित इस महत्वपूर्ण एयरपोर्ट की अनदेखी ने विकास को रोके रखा, अब तेज हुई प्रक्रिया से जगी नई उम्मीद
श्यामल प्रतीक
रक्सौल अनुमंडल संवाददाता, चाणक्य न्यूज़
पूर्वी चंपारण का सीमावर्ती शहर रक्सौल केवल एक नगर नहीं, बल्कि भारत और नेपाल के बीच आर्थिक, सामाजिक और रणनीतिक संबंधों का सबसे बड़ा प्रवेश द्वार है। प्रतिदिन हजारों लोग इस सीमा से होकर गुजरते हैं और नेपाल के विदेशी व्यापार का बड़ा हिस्सा भी इसी मार्ग से संचालित होता है। इसके बावजूद यह क्षेत्र आज भी एक ऐसे एयरपोर्ट की प्रतीक्षा कर रहा है, जिसका निर्माण छह दशक पहले हो चुका था, लेकिन जो आज तक नियमित हवाई सेवा का सपना पूरा नहीं कर सका।
1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद राष्ट्रीय सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए रक्सौल में हवाई पट्टी विकसित की गई थी। उस समय यह माना गया था कि सीमावर्ती क्षेत्र में हवाई संपर्क भविष्य की आवश्यकता होगा। लेकिन समय के साथ यह परियोजना सरकारी फाइलों में सिमटती चली गई। सरकारें बदलती रहीं, घोषणाएं होती रहीं, सर्वे होते रहे, लेकिन एयरपोर्ट का विकास आगे नहीं बढ़ सका।
आज जब राज्य सरकार ने भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया तेज कर दी है और पुनर्विकास की दिशा में ठोस पहल शुरू हुई है, तब यह सवाल फिर उठ रहा है कि आखिर 64 वर्षों तक इस महत्वपूर्ण परियोजना को उपेक्षित क्यों रखा गया?
इस लंबे विलंब के पीछे कई कारण रहे। भूमि अधिग्रहण की जटिल प्रक्रिया, प्रशासनिक मंजूरियों में देरी, वित्तीय स्वीकृतियों का लंबा इंतजार और समय-समय पर बदलती सरकारी प्राथमिकताओं ने इस परियोजना को लगातार पीछे धकेला। सीमावर्ती क्षेत्र होने के कारण सुरक्षा और तकनीकी मानकों से जुड़ी प्रक्रियाओं ने भी परियोजना को और लंबा किया।
अब तस्वीर बदलती नजर आ रही है। बिहार सरकार ने एयरपोर्ट विस्तार के लिए अतिरिक्त भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू कर दी है। प्रभावित रैयतों को मुआवजा दिया जा रहा है और जिन लोगों ने अब तक आवेदन नहीं किया है, उन्हें प्रशासन अंतिम अवसर दे रहा है। एयरपोर्ट के पुनर्विकास के लिए तकनीकी और इंजीनियरिंग प्रक्रियाएं भी आगे बढ़ चुकी हैं। यदि कार्य तय समयसीमा में पूरा होता है, तो आने वाले वर्षों में रक्सौल एयरपोर्ट से नियमित उड़ानों का सपना साकार हो सकता है।
रक्सौल एयरपोर्ट का महत्व केवल पूर्वी चंपारण तक सीमित नहीं है। यह एयरपोर्ट भारत-नेपाल सीमा के बिल्कुल निकट स्थित है और इसके सामने नेपाल का प्रमुख औद्योगिक शहर बीरगंज है। एयरपोर्ट शुरू होने से उत्तर बिहार के साथ-साथ दक्षिण नेपाल के लाखों लोगों को भी बेहतर हवाई संपर्क मिलेगा। इससे व्यापार, पर्यटन, चिकित्सा, शिक्षा और निवेश के नए अवसर पैदा होंगे। सीमावर्ती बाजारों को नई ऊर्जा मिलेगी और रोजगार के नए द्वार खुलेंगे।
राष्ट्रीय सुरक्षा के दृष्टिकोण से भी यह परियोजना अत्यंत महत्वपूर्ण है। सीमावर्ती क्षेत्र में आधुनिक हवाई अवसंरचना उपलब्ध होने से आपदा प्रबंधन, राहत कार्य, सुरक्षा बलों की त्वरित आवाजाही और प्रशासनिक प्रतिक्रिया क्षमता मजबूत हो सकती है। यह एयरपोर्ट भारत-नेपाल सीमा क्षेत्र में बेहतर संपर्क और रणनीतिक तैयारी को भी सुदृढ़ करेगा। हालांकि इसे किसी एक देश के विरुद्ध परियोजना के रूप में नहीं, बल्कि राष्ट्रीय अवसंरचना और सीमावर्ती विकास की दृष्टि से देखा जाना चाहिए।
यदि यह एयरपोर्ट वर्षों पहले विकसित हो गया होता, तो पूर्वी चंपारण का आर्थिक परिदृश्य आज कहीं अधिक मजबूत होता। उद्योग, पर्यटन और व्यापार को नई दिशा मिलती तथा युवाओं के लिए रोजगार के अवसर बढ़ते। दुर्भाग्यवश, विकास की यह उड़ान दशकों तक टलती रही।
अब जब परियोजना ने गति पकड़ ली है, तो सबसे बड़ी आवश्यकता यह है कि निर्माण कार्य समयबद्ध ढंग से पूरा हो। भूमि अधिग्रहण, मुआवजा वितरण और निर्माण प्रक्रिया में पारदर्शिता बनाए रखते हुए इस परियोजना को शीघ्र पूरा किया जाए। सीमावर्ती बिहार की जनता अब केवल घोषणाएं नहीं, बल्कि आसमान में उड़ते विमान देखना चाहती है।
रक्सौल एयरपोर्ट केवल ईंट-पत्थर का ढांचा नहीं है। यह सीमावर्ती बिहार की आकांक्षाओं, आर्थिक विकास, राष्ट्रीय महत्व और भविष्य की नई संभावनाओं का प्रतीक है। छह दशक का इंतजार बहुत लंबा हो चुका है। अब समय है कि यह सपना हकीकत बने और रक्सौल को वह पहचान मिले, जिसका वह वर्षों से हकदार है।
