ढकिया और डाली में सहेजी थारू विरासत, गबहा से आकार लेती पारंपरिक हस्तकला

नेपाल विशेष

प्राकृतिक सामग्री और पीढ़ियों पुराने कौशल से जुड़ी है समुदाय की सांस्कृतिक पहचान: संजय दास थारू

रक्सौल अनुमंडल रिपोर्टर | श्यामल प्रतिक

रक्सौल/नेपाल। हाथों का हुनर, प्रकृति से जुड़ाव और पीढ़ियों से संजोया गया पारंपरिक ज्ञान—थारू समुदाय की ढकिया और डाली में इन तीनों की खूबसूरत झलक मिलती है। इन्हें बनाने में इस्तेमाल होने वाला गबहा, जिसे कसुङ्गा भी कहा जाता है, समुदाय की पारंपरिक हस्तकला का महत्वपूर्ण आधार है। इससे तैयार वस्तुएँ घरेलू जरूरतों के साथ सांस्कृतिक पहचान से भी गहराई से जुड़ी हैं।

संजय दास थारू के अनुसार, गबहा से ढकिया, डाली और अन्य हस्तशिल्प बनाने की परंपरा समुदाय में पीढ़ियों से चली आ रही है। प्राकृतिक सामग्री को हाथों के कौशल से उपयोगी वस्तुओं में बदलने की यह कला थारू समाज की रचनात्मकता को दर्शाती है। इन वस्तुओं की बनावट में पुरखों से मिला ज्ञान और पारंपरिक जीवनशैली की झलक दिखाई देती है।

इस हस्तकला की असली धरोहर तैयार वस्तुओं के साथ उन्हें बनाने का कौशल भी है। पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होता आया यह ज्ञान तभी सुरक्षित रह सकेगा, जब नई पीढ़ी इसे सीखने और आगे बढ़ाने से जुड़ेगी। इसलिए इस परंपरा का संरक्षण सांस्कृतिक पहचान को जीवित रखने का भी प्रयास है।

आधुनिक सामग्रियों का उपयोग बढ़ने के दौर में गबहा से तैयार हस्तशिल्प को पहचान और प्रोत्साहन देने की जरूरत है। दैनिक जीवन में इनका उपयोग बनाए रखना और निर्माण की कला अगली पीढ़ी तक पहुँचाना इस दिशा में सार्थक कदम हो सकता है।

गबहा से आकार लेती ढकिया और डाली अपने भीतर एक समुदाय का हुनर, जीवनशैली और सांस्कृतिक स्मृतियाँ समेटे हुए हैं। इन्हें सहेजना थारू समाज की उस जीवंत विरासत को सहेजना है, जिसमें प्रकृति और मानवीय कौशल का सुंदर मेल दिखाई देता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *